साध्वी अणिमाश्री।।
हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोता है।
बड़ी मुश्किल सेहोताहै, चमन में दीदावर पैदा।
सदी के सौभाग्य को जमाने वाले, मंगल प्रभातकी पुण्य घड़ी, खटेड़ कुल प्रांगण में ज्योति का अवतरण। चंदेरी में द्वितीया के चांद का दर्शन, धरा जिस लाल को पाकर निहाल हो गई। सात समंदर के आर-पार उस अलौकिक पुरुष आचार्य तुलसी का 105वां जन्मदिवस अणुव्रत दिवस के रूप में बेहद उल्लास से भीगे मनहर मौसम में मनाया जा रहा है। जमाना जिसके प्रखर कतृत्व को उजागर कर रहा है। जन जन के जमीन में अमृत का वर्षण करने वाले युगपुरुष आचार्य तुलसी ने अपनी संपूर्ण शक्ति, श्रम और समय को मानवता के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। मात्र ग्यारह वर्ष की उम्र में संस्कार को त्यागकर संयमी जीवन को स्वीकार कर लिया और 2 वर्ष की उम्र में तेरापंथ धर्मसंघ के सर्वोच्च पद पर आसीन हो गए।
जब भारत आजादी की दुधिया चांदनी में भवमग्न हो रा था, स्वतंत्रता का जश्न मना रहा था। तभी तैंतीस वर्षीय आचार्य तुलसी ने उस आजादी को स्वामित्व तथा विकास की ऊंचाईयों के स्पर्श हेतु एक ऐसे आंदोलन का सूत्रपात किया जो आज अणु्व्रत के रूप में पहचान पा रहा है। अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य तुलसी ने नैतिकता के ग्राफ को ऊंचा उठाने के लिए जो देन दी है, युगधारा सदैव उनकी ऋणी रहेगी। लगभग सत्तर वर्ष के बाद आज भी अणुव्रत की आचार संहिता एक ऐसी एकादशीय व्रत-तालिका है, जो संपूर्ण विश्व को अशांति की दहकती ज्वाला को बचा सकती है। यह एक ऐसी आचार संहिता है, जो स्वस्थ समाज संरचना का आधार बन सकती है।
समता, क्षमता व ममता के मूर्तरूप आतार्य तुलसी ने नारी जागरण की दिशा में अभूतपूर्व कार्य किए हैं। तेरापंथ धर्मसंघ में समण श्रेणी का प्रवर्तन आपेक द्वारा ही उठाया गया एक ऐसा साहसिक कदम है, जिसे कोई विरलतम व्यक्ति ही उठा सकता है।
सृजन के मासुमेरू आचार्य तुलसी के प्रशासन काल में व्यक्तित्व निर्माण का एक ऐसा उपक्रम चला, जो धर्मसंघ के लिए वरदान बन गया। जिनकी पारखी नजरें प्रथम साक्षात्कार में ही पहचान लेती थी कि कौन व्यक्ति किस कार्य में कितना समर्थ और उपयोगी है। जिनकी पारखी निगाहों ने सृजन के नए स्वाष्तिक उकेरेष जिनके चरण सतत विकास पथ पर गतिमान रहे। पराक्रम व पुरुषार्थ की लौ को जिन्होंने सदा प्रज्वलित रखा। जीवन शैली में नवीनता जिनकी सहचारी रही। कठिनतम समय में ही जो हर पल मुस्कान बिखेरते रहे।
चिंतन, निर्णय और क्रियान्वित जिनके जीवन सूत्र थे। जीवटता जिनके रग-रग में रमण कर रही थी। विलक्षण था जिनकी नेतृत्व, विराट था कतृत्व। सचमुच आचार्य तुलसी सृजन के महासुमेरु थे। ऐसे शलाका पुरुष अनन्त उपकारी गुरुदेव श्री तुलसी के जन्मदिवस पर उस महान आत्मा को अनंत अनंत प्रणाम। हम सब श्रद्धा व समर्पण की त्रिपथगा में निरंतर अभिस्वात होकर उनके द्वारा निर्दिष्ट पथ पर आगे बढ़े, ऐसा बल हम सबके भीतर जगे, ऐसी अंतः प्रेरणा हर व्यक्ति को मिले, इसी मंगलभावना के साथ।
सृजन के महासुमेरू आचार्य तुलसीः साध्वी अणिमाश्री

