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Reading: सत्यं-शिवं-सौंदर्य के संमुपासक एवं समुपदेष्टा आचार्य तुलसीः साध्वी निर्वाणश्री
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सत्यं-शिवं-सौंदर्य के संमुपासक एवं समुपदेष्टा आचार्य तुलसीः साध्वी निर्वाणश्री

Last updated: November 9, 2018 8:58 am
Surabhi Saloni
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8 Min Read
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साध्वी निर्वाणश्री।।
नव मन को सौंदर्य सदा के अभीष्ट रहा है। मनोज्ञ शब्द, रूप, रस आदि उसके चित्त को बांधते रहे हैं। महाकवि कालीदास ने सौंदर्य को व्याख्यायित करते हुए कहा है- क्षणे क्षणे यन्नवतामुपैलि तदेव रूपं रमणीयतायाः प्रतिक्षण जिसमें नवीनता की प्रतीति होती रहे, वही रमणीय है। भारतीय मनीषियों ने सौंदर्य के साथ दो और विशेषणों को जोड़ा है। वे विशेषण हैं सत्य और शिव। ये दोनों विशेषण सौंदर्य को पूर्णता देने वाले हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो वही सौंदर्य सच्चे अर्थों में सौंदर्य है जो सत्य और शिव से जुड़ा हुआ हो। महान अंग्रेजी कवि कीटर्स ने इस सच्चाई के एक पक्ष को पकड़ा, इसलिए लिखा – Beauty is truth, truth beauty.
सत्य जीवन का सार तत्व है। सबसे बड़ी शक्ति है। उसे भगवत सत्ता के रूप में देखा गया है। छल प्रपंच और झूठ फरेब के इस युग में भले कभी व्यक्ति की आस्था इससे विखंडित हो जाए, पर अततोगत्वा उसे इस सच्चाई को समझना होगा। शिव सौंदर्य और सत्य की कसौटी है। जीवन के कल्याण पथ को प्रशस्त करने वाला सौंदर्य और सत्य ही ग्राह्य होता है। सबके कल्याण की कामना भारतीय संस्कृति का महान आदर्श रहा है।

महान उपासक
आचार्य तुलसी सत्य, शिव और सौंदर्य के महान उपासक थे। इनकी समन्विति ही उनका जीवन ध्येय था। प्रकृति ने उन्हें तन से सुंदर बनाया, पर वे मन मस्तिष्क से भी सदा सुंदर बन रहे। प्रत्येक कार्य को व्यवस्थित और सुंदर ढंग से संपादित करना उनकी सहज वृत्ति थी। किसी कार्य को अव्यवस्थित देखने पर उसे सुधारने के लिए वे तत्काल बोधगया देने में तत्पर हो जाते। कार्य के प्रति लापरवाही उन्हें तनिक भी पसंद नहीं थी। चलने, बोलने, बैठने आदि छोटी-छोटी प्रवृत्तियों का प्रशिक्षण भी वे बड़ी तन्मयता के साथ देते। आज तेरापंथ धर्मसभा का जो सुंदर रूप दिखाई देता है, उसका श्रेय गुरुदेव तुलसी के कर्तृत्व को ही जाता है। प्राकृतिक सौंदर्य से उन्हें सहज लगाव था। चट्टान, झरने, वृक्षावलि सरिता, समंदर आदि को देख अनायास उनका कवि मानस मुखर हो जाता। उनकी रचनाओं में प्रकृति के जीवंत रूप को सहजता से स्थान-स्थान पर देखा जा सकता है। अपने मुख्य मिशन अणुव्रत के माध्यम से संयम के घोष को बुलंद कर प्रकृति के अक्षुण्ण सौंदर्य को यथावत बनाए रखने की प्रेरणा वे सदा देते रहे। पर्यावरण परिशुद्धि की चेतना उन्होंने अणुव्रत के माध्यम से जगाई।

अटूट सत्यनिष्ठा
वे सत्य के लिए समर्पित एक महान साधक थे। किसी भी स्थिति में असत्य के साथ समझौता करना उन्हें स्वीकार्य नहीं था। उनकी सत्यता का मुख्य आधार भगवान महावीर की वाणी, आचार्य भिक्षु द्वारा प्रतिपादित दर्शन था। उनकी सत्यग्राही बुद्धि ने आध्यात्मिक एवं सामाजिक क्षेत्र में परिख्याप्त बुराईयों की जब-जब बेबाक प्रस्तुति दी, तब-तब उसे एक चुनौती के रूप में झेलना पड़ा। भयंकर बाह्य और अंतरंग विरोध सहन करना पड़ा, पर उनकी सत्य की प्रस्तुति का स्वर कभी नहीं बदला। रूढ़ धर्माराधना, छुआछूत, पर्दाप्रथा आदि के विरोध में उठनेवाले क्रांति को सुनने की स्थिति उस समय के जनमानस की नहीं थी, पर वे धैर्यपूर्वक अपनी बात कहते रहे। उन्होंने साहस के साथ गाया –
ज्यों-ज्यों चरण बढ़ेंगे आगे स्वतः मार्ग बन जाएगा।
हटना होगा उसे बीच से जो बाधक बन जाएगा।
रुक न सकेगी, मुड़ न सकेगी, सत्यक्रांति की उज्ज्वल धारा।
प्रभो! तुम्हारे पावन पथ जीवन अर्पण है सारा।।
सत्य के इस अखंड समर्पण और साहस ने एक-एक कर सच्चाईयों को समाज के गले उतार दिया। अंगड़ाई ले जन मानस जाग उठा। तुलसी भक्त हृदयों के ही नहीं अन्यान्य वोगों के भी आस्था केंद्र बन गए। नास्तिकों ने भी उन्हें मार्गदर्शक होने का सम्मान दिया।

शिव के आराधक ही नहीं, मत्रदाता
मानवमात्र के प्रति शिव/कल्याण की कामना उनके रोम-रोम में परिख्याप्त थी। इसी कामना से उत्प्रेरित हो उन्होंने धर्म के वार्तमानिक एवं समाधायक नहीं, अपितु क्षण-क्षण जीवन में शांति देने वाला तत्व मानते थे। परिष्कार की दिशा में प्रशस्त करने वाला वह एक राजपथ है। उन्होंने इस संदर्भ में गाया –
वही धर्म है सही कि जो जन-जन के मन के मांजे।
गहन तिमिर से आवृत जन-जन की आंखों को आंजे।।
कल्याण की भावना से आप्लावित हो उन्होंने निम्न तबके के लोगों को न केवल गले लगाया, अपितु विकास की दिशा में उनके चरणों को गतिमान किया। उन्होंने समझाया कि वे विवशता के कारण कम और स्वयं की दुर्बलताओं से अधिक अवश बने हुए हैं। यदि वे शराब, धूम्रपान और अफीम जैसी बुराईयों को छोड़ देते हैं तो स्वयं उनका जीवन स्तर ऊपर उठ सकता है। अज्ञान और अशिक्षा के पर्दे को चीरकर उन्हें आगे आना होगा। उनकी प्रेरणा से हजारों-हजारों ने व्यसन मुक्ति और रूढ़ि मक्ति का मंत्र अपनाकर अपने जीवन को खुशहाल बनाया। उनकी कल्याणी करुणा नारी जाति के लिए रोशनी का नया पैगाम लेकर आई। अपने जीवन के अनगिनत बेशकीमती क्षण उन्होंने नारी जाति के अस्मिता को प्रतिष्ठित करने के लिए लगाए। वे उसके अध्यात्मिक एवं सामाजिक विकास को आवश्यक समझते थे। उनकी प्रेरणा तथा प्रोत्साहन से अशिक्षा के किले में बंद राजस्थान की हजारों महिलाओं ने एक नई करवट ली। वे उच्चस्तरीय शिक्षा के शिखर तक पहुंच गई। तेरापंथ की साध्वियों की शिक्षा आज युग के लिए एक आश्चर्य के रूप में है।
वैधव्य की स्थिति में महिलाओं को जिस त्रासदी से गुजरना पड़ता है, उससे छुटकारा दिलाने में भी आचार्य श्री तुलसी का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।

प्रणाम उस महामानव को
मानव जाति के नए रोग तनाव को देख वे भीतर तक सिहर गए। उनके करुणाशील मानस से करुणा का स्रोत फूट पड़ा। ध्यान की विच्छिन्न परंपरा के अनुसंधान की जिम्मेदारी उन्होंने अपने प्रधान शिष्य मुनि नथमलजी (आचार्य महाप्रज्ञ) को सौंपी। वह अनुसंधित ध्यान पद्धति आज प्रेक्षाध्यान के रूप में अपनी वैज्ञानिकता, सरलता एवं सहजता के लिए विश्वविश्रुत है। इसके प्रयोगों से गुजरने वाला सामान्य और विशिष्ट व्यक्ति समान रूप से शांति, स्वास्थ्य और हल्केपन का अनुभव करता है। बाल कल्याण की भावना से ओतप्रोत हो उन्होंने शिक्षाजगत एवं संस्कार के समक्ष जीवन विज्ञान (मूल्य परक शिक्षा) का प्रकल्प रखा। वह प्रकल्प न केवल बाल जगत की समस्याओं का समाधान है, अपितु उन्हें एक सुयोग्य नागरिक के रूप में प्रस्तुत करता है। अपेक्षा है भारत सरकार और राज्य सरकारें गहनता से इस पर विचार करें एवं इसके प्रसार के लिए संकल्पित हों। भारत ऐसा कर विश्वगुरु के गौरव को पुनः प्राप्त कर सकता है।
सत्यं शिवं और सौंदर्य को पल-पल जीने वाले एवं वाणी से उसका संदेश प्रसारित करने वाले उस महामानव से उस दिशा में बढ़ने की प्रेरणा प्राप्त करके ही जन्मदिन मनाने के हम सच्चे अधिकारी हो सकते हैं।

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