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Reading: अनंत में लीन हुए शब्दों के चितेरे और समन्वय की राजनीति के जनक ‘अटल’
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अनंत में लीन हुए शब्दों के चितेरे और समन्वय की राजनीति के जनक ‘अटल’

Last updated: August 16, 2018 9:44 pm
Surabhi Saloni
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21 Min Read
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नई दिल्ली (ईएमएस)। शब्दों के चितेरे और सद्भावना, समन्वय की राजनीति के जनक अटल बिहारी वाजपेयी अनंत यात्रा पर चले गए. शब्दों के इस अलबेले चितेरे की रवानगी से देश के दिल में कसक सी उठी. मृत्यु अटल है किन्तु अटल का व्यक्तित्व अमर है वे भारतीय राजनीति के बहु धुर्वीय हुए विविधतापूर्ण क्षितिज पर ऐसे चमकते सितारे के समान रहे जिन्हें दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सभी ने सराहा और गले लगाया।
वाजपेयी का गुरुवार को दिल्ली के ऑल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट (एम्स) में निधन हो गया। उनका पार्थिव शरीर ७.३० बजे उनके दिल्ली निवास स्थान पर लाया जाएगा। निवास पर एक स्टेज बनाया गया, जहां उन्हें अंतिम दर्शन के लिये रखा जाएगा। अंतिम संस्कार राजघाट पर होगा। ९३ वर्षीय वाजपेयी वाजपेयी को यूरिन इन्फेक्शन और किडनी संबंधी परेशानी से जूझ रहे थे। वाजपेयी को जीवन रक्षक प्रणाली पर रखा था। बीते ११ जून को अचानक तबियत खराब होने की वजह से उन्हें एम्स में भर्ती कराया था। हालांकि,अस्पताल की और से इसे शुरुआत में एक रूटीन चेकअप कहा गया था।
– एम्स से की पुष्ठि, ५.०५ बजे ली अंतिम सांस
एम्स की ओर से तीसरे स्वास्थ्य बुलेटिन में निधन की पुष्टि करते हुए कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अंतिम सांस ५.०५ बजे पर ली। वे यूरिन इन्फेक्शन और किडनी संबंधी परेशानी से जूझ रहे थे। वाजपेयी को जीवन रक्षक प्रणाली पर रखा गया था। बीते ११ जून को अचानक तबियत खराब होने की वजह से उन्हें एम्स में भर्ती कराया था। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी लेने प्रधानमंत्री मंत्री नरेंद्र मोदी आज एम्स पहुंचे। पिछले करीब १६ घंटे में मोदी ने दूसरी बार एम्स में पूर्व प्रधानमंत्री का हालचाल जाना। प्रधानमंत्री मोदी कल शाम को भी एम्स गए थे और उनके स्वास्थ्य के बारे में जानकारी ली थी। उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, केन्द्रीय मंत्रियों सुषमा स्वराज, स्मृति ईरानी और राजनाथ सिंह के एम्स पहुंचे थे। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान, राधा मोहन सिंह और जगत प्रकाश नड्डा भी शामिल हैं। इनके अलावा नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भी एम्स पहुंचे।
– ‘भारत रत्न’ से सम्मानित
गौरतलब है कि पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी पिछले काफी दिनों से अस्वस्थ थे। बता दें कि केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार आने के बाद वाजपेयी को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया था। मालूम हो कि वाजपेयी साल १९९१, १९९६, १९९८, १९९९ और २००४ में लोकसभा सदस्य चुने गए थे। वह बतौर प्रधानमंत्री अपना कार्यकाल पूर्ण करने वाले पहले और अभी तक एकमात्र गैर-कांग्रेसी नेता थे। वर्ष १९९० के दशक में वाजपेयी सरकार के दौरान उनका बखूबी साथ देने वाले लाल कृष्ण आडवाणी भी अस्पताल पहुंचे।
वाजपेयी देश के पहले नेता हैं जो गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने थे। चुनाव जीतने और हारने को लेकर कई कीर्तिमान देश के विभिन्न राजनेताओं के नाम पर दर्ज हैं, लेकिन वाजपेयी के नाम पर दो अटल कीर्तिमान दर्ज हैं। वाजपेयी देश के एकमात्र राजनेता हैं, जो चार राज्यों के छह लोकसभा क्षेत्रों की नुमाइंदगी कर चुके हैं। उत्तरप्रदेश के लखनऊ और बलरामपुर, गुजरात के गांधीनगर, मध्यप्रदेश के ग्वालियर और विदिशा और दिल्ली की नई दिल्ली संसदीय सीट से चुनाव जीतने वाले वाजपेयी एकलौते नेता हैं। पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी का जन्‍म 25 दिसंबर 1924 को हुआ, इस दिन को भारत में बड़ा दिन कहा जाता है। वाजपेयी 1942 में राजनीति में उस समय आए, जब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उनके भाई 23 दिनों के लिए जेल गए। 1951 में आरएसएस के सहयोग से भारतीय जनसंघ पार्टी का गठन हुआ तो श्‍यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे नेताओं के साथ अटल बिहारी वाजपेयी की अहम भूमिका रही।
साल 1952 में अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार लखनऊ लोकसभा सीट से लड़ा, पर सफलता नहीं मिली। ये उत्तरप्रदेश की एक लोकसभा सीट पर हुए उप चुनाव में उतरे थे जहां उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। अटल बिहारी वाजपेयी को पहली बार सफलता 1957 में लगी। 1957 में जनसंघ ने उन्हें तीन लोकसभा सीटों लखनऊ मथुरा और बलरामपुर से चुनाव लड़ाया। लखनऊ में वो चुनाव हार गए, मथुरा में उनकी ज़मानत जब्त हो गई लेकिन बलरामपुर संसदीय सीट से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे। वाजपेयी के असाधारण व्‍यक्तित्‍व को देखकर उस समय के वर्तमान प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि आने वाले दिनों में यह व्यक्ति जरूर प्रधानमंत्री बनेगा।
वाजपेयी तीसरे लोकसभा चुनाव 1962 में लखनऊ सीट से उतरे, लेकिन उन्हें जीत नहीं मिल सकी। इसके बाद वे राज्यसभा सदस्य चुने गए। इसके बाद 1967 में फिर लोकसभा चुनाव लड़े और लेकिन जीत नहीं सके। इसके बाद 1967 में ही उपचुनाव हुआ, जहां से वे जीतकर सांसद बने। इसके बाद 1968 में वाजपेयी राष्‍ट्रीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्‍यक्ष बने। उस समय पार्टी के साथ नानाजी देशमुख, बलराज मधोक तथा लालकृष्‍ण आडवाणी जैसे नेता थे। 1971 में पांचवें लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी मध्यप्रदेश के ग्वालियर संसदीय सीट से उतरे और जीतकर संसद पहुंचे। आपातकाल के बाद हुए चुनाव में 1977 और फिर 1980 के मध्यावधि चुनाव में उन्होंने नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। 1984 में अटल बिहारी ने मध्यप्रदेश के ग्वालियर से लोकसभा चुनाव का पर्चा दाखिल कर दिया और उनके खिलाफ अचानक कांग्रेस ने माधवराव सिंधिया को खड़ा कर दिया। जबकि माधवराव गुना संसदीय क्षेत्र से चुनकर आते थे। सिंधिया से वाजपेयी पौने दो लाख वोटों से हार गए। बता दें कि अटल बिहारी ने एक बार जिक्र भी किया था कि उन्होंने स्वयं संसद के गलियारे में माधवराव से पूछा था कि वे ग्वालियर से तो चुनाव नहीं लड़ने वाले, माधवराव ने उस समय मना कर दिया था, लेकिन कांग्रेस की रणनीति के तहत अचानक उनका पर्चा दाखिल करा दिया गया। इस तरह वाजपेयी के पास मौका ही नहीं बचा कि दूसरी जगह से नामांकन दाखिल कर पाते। इसकारण उन्हें सिंधिया से हार का सामना करना पड़ा।
इसके बाद वाजपेयी 1991 के आम चुनाव में लखनऊ और मध्यप्रदेश की विदिशा सीट से चुनाव लड़े और दोनों ही जगह से जीते। इसके बाद में उन्होंने विदिशा सीट छोड़ दी। हालांकि, 1996 में हवाला कांड में अपना नाम आने के कारण लालकृष्ण आडवाणी गांधीनगर से चुनाव नहीं लड़े। इस स्थिति में अटल बिहारी वाजपेयी ने लखनऊ सीट के साथ-साथ गांधीनगर से चुनाव लड़ा और दोनों ही जगहों से जीत हासिल की। इसके बाद से वाजपेयी ने लखनऊ को अपनी कर्मभूमि बना ली। 1998 और 1999 का लोकसभा चुनाव लखनऊ सीट से जीतकर सांसद बने।
दिलचस्प बात ये है कि 1962 में जब अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव हार गए तो उसके बाद वे राज्यसभा सदस्य के रूप में संसद पहुंचे। इसके बाद 1984 में जब हारे तो भी 1986 में वो राज्यसभा के सदस्य के रूप में चुने गए। आपातकाल के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की जीत हुई थी और वे मोरारजी भाई देसाई के नेतृत्‍व वाली सरकार में विदेश मामलों के मंत्री बने। विदेश मंत्री बनने के बाद वाजपेयी पहले नेता थे जिन्‍होंने संयुक्‍त राष्‍ट्र महासंघ को हिन्‍दी भाषा में संबोधित किया।
इसके बाद जनता पार्टी अंतर्कलह के कारण बिखर गई और 1980 में वाजपेयी के साथ पुराने दोस्‍त भी जनता पार्टी छोड़ भारतीय जनता पार्टी से जुड़ गए। वाजपेयी बीजेपी के पहले राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष बने और वे कांग्रेस सरकार के सबसे बड़े आलोचकों में शुमार किए जाने लगे। 1994 में कर्नाटक,1995 में गुजरात और महाराष्‍ट्र में पार्टी जब चुनाव जीत गई उसके बाद पार्टी के तत्कालीन अध्‍यक्ष लालकृष्‍ण आडवाणी ने वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का उम्‍मीदवार घोषित कर दिया था। वाजपेयी 1996 से लेकर 2004 तक 3 बार प्रधानमंत्री बने। 1996 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और वाजपेयी पहली बार प्रधानमंत्री बने। हालांकि उनकी सरकार 13 दिनों में संसद में पूर्ण बहुमत हासिल नहीं करने के चलते गिर गई।
1998 के दोबारा लोकसभा चुनाव में पार्टी को ज्‍यादा सीटें मिलीं और कुछ अन्‍य पार्टियों के सहयोग से वाजपेयी ने एनडीए का गठन किया और वे फिर प्रधानमंत्री बने। यह सरकार 13 महीनों तक चली, लेकिन बीच में ही जयललिता की पार्टी ने सरकार का साथ छोड़ दिया जिसके चलते सरकार गिर गई। 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी फिर से सत्‍ता में आई और इस बार वाजपेयी ने अपना कार्यकाल पूरा किया।
अटल के निधन पर पीएम मोदी बोले, ‘मैं नि:शब्द हूं, लेकिन भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा
प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधन पर शोक यक्‍त किया। पीएम मोदी ने कहा कि ‘मैं नि:शब्द हूं, शून्य में हूं, लेकिन भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा है। हम सभी के श्रद्धेय अटल जी हमारे बीच नहीं रहे। अपने जीवन का प्रत्येक पल उन्होंने राष्ट्र को समर्पित कर दिया था। उनका जाना, एक युग का अंत है। लेकिन वो हमें कहकर गए हैं- ‘मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, ज॰िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूं? अटल जी आज हमारे बीच में नहीं रहे, लेकिन उनकी प्रेरणा, उनका मार्गदर्शन, हर भारतीय को, हर भाजपा कार्यकर्ता को हमेशा मिलता रहेगा। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और उनके हर स्नेही को ये दुःख सहन करने की शक्ति दे। ओम् शांति ! हमारे प्रिय अटल जी के देहावसान पर पूरा राष्‍ट्र दुखी है। उनके निधन से एक युग का अंत हो गया। वे राष्‍ट्र के लिए जिये और दशकों तक उसकी अथक सेवा की। इस दुख की घड़ी में मैं उनके परिजनों, भाजपा कार्यकर्ताओं और उनके लाखों प्रशंसकों के प्रति संवेदना व्‍यक्‍त करता हूं। ओम् शांति ! यह अटल जी का बेमिसाल नेतृत्‍व था, जिसने २१वीं सदी के मजबूत, समृद्ध और समावेशी भारत की आधारशिला रखी। विभिन्‍न क्षेत्रों के संबंध में उनकी दूरगामी नीतियों ने भारत के प्रत्‍येक नागरिक के जीवन को स्‍पर्श किया। मेरे लिए अटल जी का निधन एक निजी और अपूरणीय क्षति है। उनके साथ मेरी असंख्‍य प्रिय स्‍मृतियां हैं। वे मेरे जैसे कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा स्रोत थे। मैं उनकी तीक्ष्‍ण मेधा और शानदार वाक्‍य चातुर्य का विशेष तौर पर स्‍मरण करता हूं। अटल जी की जीवटता और संघर्ष के कारण ही भारतीय जनता पार्टी का उत्‍तरोत्‍तर विकास होता रहा है। उन्‍होंने भारतीय जनता पार्टी के संदेश को प्रसारित करने के लिए देश भर की यात्रा की, जिसके आधार पर भारतीय जनता पार्टी हमारी राष्‍ट्रीय राजनीति और कई राज्‍यों में मजबूत स्‍थिति में आ गई,’
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा है कि अटल बिहारी वाजपेयी ने तप और अथक परिश्रम से पार्टी को सींचकर वटवृक्ष बनाया और भारतीय राजनीति में अमिट छाप छोड़ी। शाह ने ट्वीट किया, ‘अटलजी एक ऐसे लोकप्रिय राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरे थे जिनका मानना था कि सत्ता सेवा का साधन है और राष्ट्रीय हितों से समझौता किये बगैर उनका राजनीतिक जीवन बेदाग रहा और इसलिए लोगों ने राजनीतिक तथा सामाजिक सीमाओं से परे हटकर उनके प्रति प्यार और सम्मान दिखाया।’
पूर्व प्रधानमंत्री को देश के अति लोकप्रिय भारतीय नेताओं में से एक बताते हुए शाह ने कहा कि वाजपेयी ने भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष के रूप में अपने तप और अथक परिश्रम से देश की राजनीति में एक वटवृक्ष को सींचा। भाजपा प्रमुख ने कहा, ‘एक महान राजनेता, शानदार वक्ता, कवि और देशभक्त का निधन न केवल भाजपा के लिए बल्कि पूरे देश के लिए अपूरणीय क्षति है।’
उन्होंने कहा कि उनकी सोच, कविताएं, दूरदर्शिता और राजनीतिक कौशल हमेशा सभी का मार्गदर्शन करेगा। शाह ने कहा, ‘एक तरफ तो अटलजी ने विपक्ष की पार्टी के प्रमुख के रूप में एक आदर्श विपक्ष की भूमिका निभाई वहीं दूसरी ओर उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में देश को निर्णायक नेतृत्व उपलब्ध कराया। भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि वाजपेयी ने अपने विचारों और सिद्धांतों से भारतीय राजनीति में एक अमिट छाप छोड़ी।
अटल जी के अंतिम दर्शन के लिये निवास पर बनाया स्टेज, पहुंचे दिग्गज नेता
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कृष्णा मेनन लेन स्थित सरकारी आवास के सामने एक स्टेज बनाया जा रहा है। एम्स में वीआईपी मूवमेंट तेज हो गया है। इस समय रवि शंकर प्रसाद समेत अन्य बीजेपी के नेता वाजपेयीजी के सरकारी निवास पर पहुंचे हैं। बीमारी के चलते ११ जून से दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी कल रात से ही वेंटिलेटर पर थे। पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोबारा एम्स पहुंचते थे। बता दें कि कल भी पीएम मोदी एम्स गए थे। एम्स में तमाम दलों के नेताओं का आना-जाना लगा हुआ है वहीं वाजपेयी जी के सरकारी आवास के बाहर भी हलचल देखी जा रही है। आवास के बाहर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत कर दी गई है, साथ ही ट्रैफिक पुलिस भी यातायात को नियंत्रण में रखे हुए है। कुछ देर पहले निगम बोध श्मशान घाट की गाड़ी भी भाजपा मुख्यालय पहुंची है।
अटल बिहारी ने २५ बार देखी थी ड्रीम गर्ल की ‘फिल्म’
नई दिल्ली (ईएमएस)। देश के पूर्व प्रधानमंत्री और भारत की लोकप्रिय हस्तियों में से एक अटल बिहारी वाजपेयी की तबीयत अभी भी नाजुक बनी हुई है, राजधानी दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान से जारी मेडिकल बुलेटिन में कहा कि पिछले ३६ घंटे में उनके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हुआ है। वाजपेयी अभी भी लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर हैं। पूरा देश अटल के लिए दुआएं मांग रहा है। इस वक्त नेताओं का जमावड़ा एम्स में लगा हुआ है। अटल बिहारी वाजपेयी केवल एक राजनेता ही नहीं बल्कि एक बेहतरीन लेखक, उम्दा कवि, प्रखर वक्ता और सफल पीएम रहे हैं। उनके जीवन से जुड़ी ऐसी बहुत सारी बातें हैं जिनके बारे में लोगों को पता ही नहीं है। आप में से बहुत कम लोग जानते होंगे कि अटल बिहारी वाजपेयी को फिल्में देखने का भी शौक था और उनकी मनपसंद अभिनेत्री बॉलीवुड की ड्रीम गर्ल हेमामालिनी रहीं हैं। इस बात का खुलासा खुद हेमा ने, जो कि इस वक्त मथुरा से बीजेपी सांसद हैं, ने किया था। हेमा ने बताया कि कुछ समय पहले मैंने भाजपा नेताओं से कहा था कि मेरे हर भाषण में अटल जी का जिक्र होता है लेकिन उनसे मिलने का सौभाग्य मुझे मिला नहीं, जिसके कुछ वक्त बाद बीजेपी नेताओं ने मेरी मुलाकात अटल जी से करवाई, लेकिन जब मैं मिली उनसे तो मुझे लगा कि वो खुलकर बात नहीं कर रहे हैं, वो बात करने में थोड़ा हिचकिचा रहे हैं। तब मैंने वहां मौजूद एक महिला से पूछा कि क्या बात है? अटल जी ठीक से बात क्यों नहीं कर रहे हैं, इस पर उन्होंने कहा कि असल में वह आपके बहुत बड़े फैन हैं। उन्होंने १९७२ में आई आपकी फिल्म ‘सीता और गीता’ २५ बार देखी है। आज अचानक आपको सामने पाकर वो हिचकिचा रहे हैं और ऐसा होना स्वाभाविक भी है। हेमा ने कहा था कि ये बात मेरे लिए काफी हैरानी भरी थी लेकिन मुझे ये बात काफी अच्छी लगी थी।
जब अटलजी को इलाज़ के लिए अमेरिका भेजा था राजीव ने
सोनिया गांधी के अमेरिका में इलाज़ के बारे में भले ही एक पक्ष द्वारा नकारात्मक टिप्पणियां की जा रही हों किन्तु एक दौर ऐसा भी था जब दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अटल बिहारी वाजपेयी को इलाज़ के लिए अमेरिका भिजवाने की व्यवस्था की थी। राजीव गांधी का जिक्र करते हुए वाजपेयी ने वर्ष 1991 में एक साक्षात्कार में कहा था, ‘राजीव गांधी की असमय मौत मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति भी है। राजीव जी ने कभी भी राजनीतिक मतभेदों को आपसी संबंधों पर हावी नहीं होने दिया। मैंने अपनी बीमारी की बात ज्यादातर लोगों को नहीं बताई थी लेकिन राजीव गांधी को किसी तरह से इस बारे में पता चल गया। उसके बाद उनकी मदद के कारण ही मैं स्वस्थ हो पाया।’
अटल ने जिस घटना के बारे में बताया था, वह 1987-88 के आसपास की है। तब अटल जी सांसद हुआ करते थे। उनके पेट में हल्का हल्का दर्द होता था। मेडिकल चेकअप के दौरान डॉक्टरों ने उनकी किडनी में इंफेक्शन बताया था। उस समय भारत मेडिकल क्षेत्र में इतनी एडवांस स्टेज में नहीं था। उन्हें अमेरिका में इलाज कराने की सलाह दी गई जो बेहद खर्चीला था। अटलजी की इस बीमारी के बारे में पता चलते ही राजीव चिंतित हो गए और उन्होंने एक योजना के तहत उन्हें अमेरिका भेजने की व्यवस्था की।
अटल ने बताया था, राजीव गांधी ने उनको अपने दफ्तर में बुलवाया। उन्होंने वाजपेयी से कहा कि अमेरिका में में संयुक्त राष्ट्र संघ के एक कार्यक्रम में आपको भारतीय प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बनना है। उसके बाद राजीव ने कहा कि आप न्यूयॉर्क जाएंगें तो मुझे अच्छा लगेगा। मुझे उम्मीद है कि आप इस अवसर का लाभ उठाएंगें और वहां अपना इलाज कराएंगें। मैंने विदेश विभाग के अधिकारियों को बता दिया है और वे आपका इलाज करा कर हीं भारत लौटेंगे। राजीव की इस अपनेपन से भरे व्यवहार से अटलजी भावुक हो गए थे। अमेरिका से इलाज कराकर वे स्वस्थ होकर भारत लौटे थे।

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