विलेपार्ले {मुंबई} विकास धाकड़/ धर्मचक्रवर्ती आचार्यश्री महाश्रमणजी की विदुषी शिष्या साध्वी श्री राकेश कुमारीजी,साध्वीमलयविभाजी, साध्वी विपुलयशाजी,साध्वी चेतस्वीप्रभाजी के सानिध्य में आचार्यश्री महाश्रमणजी का त्रिदिवसीय कार्यक्रम एक साथ हर्षोल्लास से मनाया गया। साध्वी श्री के नमस्कार महामंत्र से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ।
साध्वी राकेशकुमारीजी ने धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहा-आज पूरे विश्व में आचार्य महाश्रमण का पदाभिषेक मनाया जा रहा है। सरदारशहर की पावन धरा पर दूगड कुल का पवित्र प्रांगण माँ नेमादेवी की कुक्षी से अवतारी के रूप में अवतार लेकर सम्पूर्ण विश्व को आलोकित किया। दो दो आचार्यों के चरणों में समर्पण भाव विनयभाव से अर्हताओं को प्राप्त कर गुरुओं के हृदय में स्थान जमाया। दो आचार्यों की कसौटी पर खरे उतरे और आज आपके सानिध्य में चौथे आरे का नजारा बरत रहा है। जैसे महाविदेह क्षेत्र में तीर्थंकर सुशोभित होते वैसे आज आप तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य महाश्रमण वीतराग तीर्थंकर सम सुशोभित हो रहे है।
साध्वी श्री राकेशकुमारी जी ने कहा आचार्य महाश्रमण एक सिद्ध पुरुष महान योगी महात्मा है। आपके पावन पवित्र मार्गदर्शन में हमें अपनी अध्यात्म साधना करते हुए अंतिम सांस तक संघ सेवा करती रहूँ ऐसा आशीर्वाद चाहती हूँ। विलेपारले महिला मंडल द्वारा मंगलाचरण हुआ। ज्ञानशाला प्रशिक्षिकाओं में सांताक्रुज ने ‘इन्द्रधनुषी रंगों’ की उपमा देते हुए सुन्दर प्रस्तुति पेश की। गंभीरमलजी डाकलिया ने विचार रखे।
ज्ञानशाला सांताक्रुज बच्चों ने एक्शन सॉन्ग से प्रस्तुति दी। साध्वी चेतस्वीप्रभाजी ने विशेषताओं पर प्रकाश डाला। साध्वी मलयविभाजी ने आचार्य प्रवर की विशिष्ट विशेषताओं का मूल्यांकन करते हुए अनेक अनेक घटना प्रसंगों को उजागर करते हुए कहा – वात्सल्यमूर्ति व अमृत के महासागर है। संगायक प्रकाशजी श्रीमाल ने संगीत की मधुर स्वरलहरिया से सभा को खुशनुमा बना लिया। साध्वी विपुलयशाजी ने कुशलता से मंच का संचालन किया।
आचार्य महाश्रमण का 65वां जन्मोत्सव, दीक्षोत्सव व 17वां पदाभिषेक उल्लासपूर्वक संपन्न

