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Analysis: अंतरिक्ष में भारत के बढ़ते कदम, आम लोगों के रोजमर्रा के जीवन और संघर्ष में कैसे आएगा बदलाव ?

Last updated: July 14, 2019 3:32 pm
Surabhi Saloni
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5 Min Read
File Photo
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प्रो. मुहम्मद नईमुद्दीन।।
चंद्रयान-2 के सफल प्रक्षेपण के साथ भारत यह उपलब्धि हासिल करने वाला चौथा देश बन जाएगा। केवल अमेरिका, रूस और चीन ने ही यह उपलब्धि हासिल की है। यह सभी भारतीयों के लिए गर्व का क्षण है। अतीत में, परमाणु बमों के सफल परीक्षणों से लेकर मार्स ऑर्बिटर मिशन तक, भारत ने विश्व बिरादरी के सामने खुद को साबित किया है। इन सफलताओं ने हमारे प्रति दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है, और विश्व बिरादरी ने हमारी सफलता और असफलताओं को देखना शुरू किया और विश्लेषण किया। इसलिए यह विचार करने का समय है कि यह सफलता भारतीयों के लिए क्या मायने रखती है। हमें खुद से पूछना चाहिए कि क्या यह सफलता आम नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन और संघर्ष में कुछ भी बदलाव लाएगी। यह अनुसंधान और विकास में उन प्राथमिकताओं को प्रतिबिंबित करने का एक अवसर है, जिस पर हमारे जैसे देश को निवेश करना चाहिए।
विज्ञान में अनुसंधान मुख्य रूप से दो कारकों द्वारा संचालित होता है; पहला इंसान भौतिक घटनाओं और उनके आस- पास की हर चीज को समझने की जिज्ञासा रखता है, और दूसरा समाज और लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करना। सामान्य रूप से दोनों कारक पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं हैं क्योंकि दोनों एक दूसरे को चलाते हैं और विपरीत भी हो सकते हैं। हालांकि, राष्ट्रों और समाजों ने इनमें से किसी एक कारक पर अपने शोध और विकास को प्राथमिकता देने और ध्यान केंद्रित करने पर अपनी पसंद बनाई है, जो कुछ मापदंडों पर निर्भर करता है। सभी देशों और समाजों के लिए दो कारकों के बीच संतुलन और प्रतिस्पर्धा अलग है। उदाहरण के लिए, एक विकसित राष्ट्र आसानी से पहले कारक पर अधिक संसाधन केंद्रित कर सकता है और खर्च कर सकता है, लेकिन एक विकासशील या अविकसित राष्ट्र दूसरे कारक को ही सर्वोच्च प्राथमिकता देने को विवश होगा। जिसके तहत शोध और अनुसंधान से लोगों का जीवन आसान बने और उनकी दैनिक जरूरतें पूरी कर सके।
हम 125 करोड़ आबादी वाले देश हैं और दुनिया के किसी भी देश की तुलना में हमारी जरूरतें और प्राथमिकताएं पूरी तरह से अलग हैं। हमारे यहां करीब 30 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। हमारे स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और अन्य शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों में संसाधनों की भारी कमी है। हमारे संस्थानों में योग्य शिक्षकों, प्रशिक्षकों, प्रयोगशाला उपकरणों आदि की कमी है। जब हम पश्चिमी देशों में उपलब्ध बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता और स्तर के साथ इनकी तुलना करते हैं तो हम खुद को सबसे नीचे पाते हैं। उच्च प्रौद्योगिकी के मामले में भी हम आयात पर आश्रित हैं। देश की रक्षा के लिए आवश्यक हथियारों, गोला-बारूद और नवीनतम उपकरणों और प्रौद्योगिकी हमें खरीदनी पड़ रही है। इनमें से कई प्रौद्योगिकी निर्यातक देश हमसे बहुत छोटे हैं और इस क्षेत्र में निवेश भी उन्होंने हमसे बाद में करना शुरू किया।
सही दिशा में अनुसंधान और विकास की कमी के कारण या अपनी प्राथमिकताओं के गलत निर्धारण के कारण हम विज्ञान या प्रौद्योगिकी में कोई महत्वपूर्ण खोज नहीं कर पाए हैं। आलम यह है कि अनुसंधान को बढ़ावा देने वाली तमाम योजनाओं के बावजूद इतने वर्षों में हम एक नोबल विजेता नहीं तैयार कर सके। जब तक हमारे वैज्ञानिक, विज्ञान नौकरशाही और नीति नियंताओं की सोच में बदलाव नहीं आएगा, तब तक भारत विज्ञान अनुसंधान और तकनीक के क्षेत्र कभी भी प्रगति नहीं कर पाएगा। यह जरूरी है कि वैज्ञानिक समाज की तात्कालिक जरूरतों को ध्यान में रखकर शोध करें और सरकार उसे मदद करे। हमारे शोध को बौद्धिक और तकनीकी दोनों पहलुओं के साथ राष्ट्र की तात्कालिक और लंबे अवधि की जरूरतों के साथ जोड़ा जाना चाहिए। अब जरूरत है कि हम विकसित देशों के बराबर हम भी शिक्षा, शोध और अनुसंधान में निवेश करें और भारत को ज्ञान का केंद्र बनाएं जैसाकि हमारा गौरवशाली अतीत रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण 2017-2018 ने परिणाम को बेहतर बनाने के लिए विज्ञान और अनुसंधान एवं विकास पर खर्च को दोगुना करने की आवश्यकता पर जोर दिया है, लेकिन अभी तक कुछ भी नहीं किया गया है। शैक्षिक प्रणाली को मजबूत और उत्पादक बनाकर, शोध और अनुसंधान को मजबूत करके और इसे सही दिशा देकर ही हम सभ्य और सम्मानजनक जीवन जीने वाले प्रत्येक नागरिक के साथ एक विकसित देश बन सकते हैं।

Thanks:/www.jagran.com

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