27.08.2025, बुधवार, कोबा, गांधीनगर (गुजरात)। पर्युषण महापर्व का शिखर दिवस भगवती संवत्सरी महापर्व। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान शिखर पुरुष, अध्यात्मवेत्ता, मानवता के मसीहा, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की सन्निधि में श्रद्धालुओं का उमड़ता श्रद्धा, आस्था, विश्वास व उमंग का भाव। प्रेक्षा विश्व भारती का पूरा परिसर जनाकीर्ण। सभी अपने आराध्य के दर्शन व मंगलपाठ से भगवती महासंवत्सरी महापर्व को उपवास के माध्यम से आध्यात्मिक रूप में मनाने को आतुर दिखाई दे रहे थे। भगवती संवत्सरी के विशेष महत्त्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि सूर्योदय से पूर्व ही बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रीचरणों में आध्यात्मिक लाभ उठाने को पहुंच गए थे। प्रातः सात बजे से ही ‘वीर भिक्षु समवसरण’ में कार्यक्रम का शुभारम्भ हो गया। तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी लगभग दस बजे प्रवचन पण्डाल में पधारे तो पूरा प्रवचन पण्डाल जयघोष से गुंजायमान हो उठा।
भगवती संवत्सरी महापर्व के अवसर पर सर्वप्रथम महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पर्युषण महापर्व पर प्रारम्भ किए गए ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ के वर्णन प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए कहा कि जैन आम्नाय की दो परंपराओं के जैन श्वेताम्बर के विभाग में भाद्रव शुक्ला चतुर्थी अथवा पंचमी को आयोजित होती है। आज उस भगवती संवत्सरी की उपासना का दिन हैं। वर्ष भर में अनेक तिथियां अपने-अपने महत्त्व वाली आती हैं। नवरात्रि, अक्षय तृतीया, भगवान महावीर का जन्मकल्याणक, दीक्षा दिवस, मर्यादा महोत्सव, आचार्यों के महाप्रयाण दिवस आदि वर्ष में अनेक दिनांक अथवा तिथियां आती हैं, जिनका अपना महत्त्व है। इसके अलावा दिवाली, होली व विजयादशमी भी आती है। आज भगवती संवत्सरी जो भाद्रव शुक्ला चतुर्थी अथवा पंचमी को आती है। आध्यात्मिक आराधना की दृष्टि से जैन श्वेताम्बर तेरापंथी परंपरा में इससे बड़ा कोई दिन नहीं है। यह सवोत्त्कृष्ट आध्यात्मिक आराधना से जुड़ा हुआ दिन है। एक सप्ताह तो मानों भगवती संवत्सरी की पृष्ठभूमि के रूप में और उत्कृष्ट दिन आज का होता है। यह भगवती संवत्सरी क्षमापना पर्व अथवा मैत्री दिवस के रूप में भी है।
आज के दिन चौरासी लाख जीव योनियों के साथ खमतखामणा होती है। इसके एक दिन बाद क्षमापना दिवस आयोजित किया जाता है, जिसमें चौरासी लाख जीव योनियों के साथ खमतखामणा किया जाता है। आज का दिन साधु-साध्वियों के लिए तो मानों गोचरी-पानी आदि से मुक्त दिन होता है। यह उपवास व तपस्या का दिन है। गृहस्थ आज के दिन उपवास के साथ पौषध भी करते हैं। यह वर्ष में एक दिन ऐसा है जो श्रद्धेय-सा बन गया है। यह आत्मचिंतन का दिन भी है। आचार्यश्री अनेक संदर्भित गीतों का संगान करते हुए आगे कहा कि जैन धर्म में अहिंसा का कितना महत्त्व है। छोटी-छोटी बातों में हिंसा से बचने का प्रयास किया जाता है। साधु के पांच महाव्रत होते हैं। इन पांच महाव्रतों का साधु को कड़ाई से पालन करने का प्रावधान है। इसके साथ साधु रात्रि भोजन-पानी विरमण की बात होती है।
श्रावक-श्राविकाएं भी धर्म से जुड़े हुए हैं। बच्चों और युवकों में भी धर्म के संस्कार पुष्ट रहें। बच्चे नवकार मंत्र को याद भी करें और समय-समय पर जप करने का भी प्रयास करना चाहिए। इसके साथ श्रावक-श्राविकाएं अपने साथ-साथ बच्चों के भी भोजन की शुद्धता के प्रति जागरूकता रखें। बच्चे देश में कहीं जाकर पढ़ें अथवा विदेश जाकर पढ़ें, किन्तु भोजन में कहीं भी नॉनवेज का समावेश न हो जाए। नॉनवेज से बचने का प्रयास होना चाहिए।
आचार्यश्री ने ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ के वर्णन प्रसंग का समापन करते हुए कहा कि भगवान महावीर की आत्मा ने अपने अंतिम 27वें भव में वर्धमान के रूप में आई और बाल्यावस्था में थे, तब उनकी निर्भीकता की परीक्षा एक देव द्वारा ली गई थी। बालक वर्धमान को भी पढ़ने के लिए पाठशाला ले जाया गया, लेकिन इन्द्र द्वारा ली गई परीक्षा के कारण वर्धमान को पहले ही दिन पाठशाला जाने से छुट्टी मिल गई।
बचपन का समय विकास का होता है। बचपन के समय में सबसे पहले विद्यार्जन के लिए होता है। जीवन के पहले भाग में विद्या के अर्जन का विशेष समय होता है। हमारे अनेक चारित्रात्माएं भी हैं जो किशोरावस्था में हैं। उन्हें अपने भीतर ज्ञान के विकास का खूब अच्छा प्रयास करना चाहिए। वर्धमान बड़े हुए तो उनका राजकुमारी यशोदा के साथ विवाह सम्पन्न हुआ। कुछ समय बाद ही उन्होंने दीक्षा ली और अपने हाथ से अपने केशों का लुंचन कर लिया। बेले के तप में उन्होंने सामायिक चारित्र ग्रहण कर लिया और वे अनगार बन गए। वर्धमान से भगवान महावीर हो गए।
आचार्यश्री ने छह प्रहरी पौषध ग्रहण करने वाले तपस्वियों सहित अनेकानेक रूपों में तपस्या करने वाले श्रद्धालुओं ने भी आचार्यश्री से अपनी-अपनी धारणानुसार अपनी-अपनी तपस्या का प्रत्याख्यान किया। प्रत्याख्यान के उपरान्त आचार्यश्री ने पुनः भगवान महावीर के साधुत्व काल के अनेक घटना प्रसंगों का वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को अनेक प्रेरणाएं प्रदान करते हुए ‘भगवान महावीर के अध्यात्म यात्रा’ के व्याख्यान क्रम को सम्पन्न किया।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन व प्रेरणा के पश्चात मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी ने भगवती संवत्सरी के महत्त्व को व्याख्यायित किया। मुनि राजकुमारजी ने संवत्सरी के संदर्भ में सुमधुर गीत का संगान किया। आचार्यश्री एक बार प्रवास स्थल में पधारे। इधर ‘वीर भिक्षु समवसरण’ में आध्यात्मिक कार्यक्रम निरंतर गतिमान रहा।
पुनः आचार्यश्री महाश्रमणजी लगभग तीन बजे के बाद पुनः वीर भिक्षु समवसरण में पधारे तेरापंथ के आचार्यों के जीवन प्रसंगों का वर्णन कर जनता को अपने वचनामृत का पान कराया तो मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी ने वर्तमान अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के जीवन प्रसंगों को वर्णित किया। इस प्रकार पूरे दिन श्रद्धालु आचार्यश्री की अमृतवाणी के साथ-साथ चारित्रात्माओं की वाणी के लाभान्वित होते रहे।
सवोत्त्कृष्ट आध्यात्मिक आराधना का दिन है भगवती संवत्सरी महापर्व : महातपस्वी महाश्रमण
Highlights
- युगप्रधान आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में उमड़ा आस्था व श्रद्धा का सैलाब
- शांतिदूत ने ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ वर्णन प्रसंग किया सुसम्पन्न
- तेरापंथाधिशास्ता ने तेरापंथ धर्मसंघ के पूर्वाचार्यों के कर्तृत्वों को किया व्याख्यायित
- मुख्यमुनिश्री भगवती संवत्सरी के महत्त्व व वर्तमान अधिशास्ता के जीवन प्रसंगों का किया वर्णन
- प्रातः सात बजे से पूरे दिन श्रद्धालुओं पर होती रही आध्यात्मिक वर्षा

