मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में शनिवार का दिन ऐतिहासिक बन गया, जब करीब दो दशकों बाद ठाकरे बंधु-उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे-एक मंच पर एक साथ नजर आए। मुंबई के वर्ली स्थित एनएससीआई डोम में आयोजित ‘मराठी विजय रैली’ में दोनों नेताओं ने मराठी भाषा और अस्मिता की रक्षा के लिए एकजुटता का प्रदर्शन किया। यह रैली महाराष्ट्र सरकार द्वारा स्कूलों में हिंदी को तीसरी अनिवार्य भाषा बनाने के फैसले को वापस लेने की जीत के उपलक्ष्य में आयोजित की गई थी। महाराष्ट्र सरकार ने 17 जून को एक आदेश जारी कर कक्षा 1 से 5 तक मराठी और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य करने की घोषणा की थी। इस फैसले का शिवसेना (यूबीटी) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने कड़ा विरोध किया। दोनों दलों ने इसे मराठी भाषा और संस्कृति पर हमला करार देते हुए 5 जुलाई को संयुक्त रैली का ऐलान किया। जनता के दबाव और ठाकरे बंधुओं के आंदोलन के बाद सरकार ने 29 जून को इस नीति को वापस ले लिया, जिसे दोनों नेताओं ने मराठी अस्मिता की जीत बताया। रैली में राज ठाकरे ने अपने बेबाक अंदाज में कहा, “मैंने पहले ही कहा था कि मेरा महाराष्ट्र किसी भी राजनीति से बड़ा है। आज 19 साल बाद हम दोनों साथ आए हैं। जो काम बालासाहेब ठाकरे नहीं कर पाए, वह देवेंद्र फडणवीस ने कर दिखाया—हमें एक साथ लाने का काम।” उन्होंने मजाकिया लहजे में मुख्यमंत्री फडणवीस को इस एकजुटता का श्रेय दिया। राज ने यह भी कहा, “हम शांत हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम डरते हैं। मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की साजिश को हम बर्दाश्त नहीं करेंगे।”उद्धव ठाकरे ने मराठी पहचान पर जोर देते हुए कहा, “हम गुंडे हैं, अगर न्याय के लिए गुंडागिरी करनी पड़े, तो हम करेंगे। हम साथ आए हैं और एक साथ रहेंगे।” उन्होंने घोषणा की कि दोनों भाई मिलकर मुंबई नगर निगम और महाराष्ट्र की सत्ता पर कब्जा करेंगे। उद्धव ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी लड़ाई किसी भाषा या समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि मराठी भाषा और संस्कृति को उचित सम्मान दिलाने के लिए है। रैली में शिवसेना (यूबीटी) और मनसे के कार्यकर्ताओं का उत्साह चरम पर था। दोनों नेताओं के गले मिलने और एक साथ मंच साझा करने के दृश्य ने समर्थकों में नई ऊर्जा भरी। रैली में साहित्यकार, शिक्षक, कलाकार और मराठी प्रेमी बड़ी संख्या में शामिल हुए, और किसी भी पार्टी का झंडा नहीं दिखाई दिया, जिससे यह एक सामाजिक आंदोलन का रूप लेता दिखा।
हालांकि, उद्धव के गठबंधन सहयोगी कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी (एसपी) ने इस रैली से दूरी बनाए रखी। कांग्रेस ने कहा कि वह हिंदी थोपने के खिलाफ है, लेकिन आगामी बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनावों से पहले गैर-मराठी वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहती। 2005 में शिवसेना छोड़कर राज ठाकरे ने 2006 में मनसे बनाई थी, जिसके बाद दोनों भाइयों के रास्ते अलग हो गए थे। अब 20 साल बाद इस पुनर्मिलन ने महाराष्ट्र की राजनीति में नए समीकरणों की संभावना जगा दी है। विश्लेषकों का मानना है कि यह एकता न केवल मराठी अस्मिता को मजबूती देगी, बल्कि आगामी बीएमसी और विधानसभा चुनावों में भी दोनों दलों को फायदा पहुंचा सकती है। रैली में आदित्य ठाकरे और अमित ठाकरे के साथ-साथ परिवार के अन्य सदस्यों की मौजूदगी ने पारिवारिक एकता को भी रेखांकित किया। संजय राउत ने इसे “महाराष्ट्र के लिए त्योहार” करार देते हुए कहा, “यह मराठी मानुष को दिशा देने वाला क्षण है।” राज और उद्धव ने संकेत दिए हैं कि यह एकता केवल रैली तक सीमित नहीं रहेगी। दोनों भाई अगस्त में महाराष्ट्र यात्रा की योजना बना रहे हैं, जिससे मराठी अस्मिता के मुद्दे को और मजबूती मिल सकती है। इस ऐतिहासिक मिलन ने न केवल ठाकरे परिवार को एकजुट किया, बल्कि महाराष्ट्र की सियासत में एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत भी दिया है।
महाराष्ट्र की सियासत में ऐतिहासिक बदलाव, 19 साल बाद राज-उद्धव एक मंच पर
Highlights
- हम गुंडे हैं, अगर न्याय के लिए गुंडागिरी करनी पड़े, तो हम करेंगे: उद्धव ठाकरे
- मैंने पहले ही कहा था कि मेरा महाराष्ट्र किसी भी राजनीति से बड़ा है: राज ठाकरे

