बेंगलुरु। श्री श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन श्रावक संघ ट्रस्ट एवं चातुर्मास समिति, हलसुरु के तत्वावधान में सुब्रह्मण्यम स्वामी कल्याण मंडप में आचार्य पार्श्वचंद्र आदि ठाणा-7 के सान्निध्य में पूज्य गुरुदेव डॉ. श्री पदमचन्द्रजी म.सा. ने प्रात:कालीन क्लास में कहा कि दर्शन की शुद्धता जैन जीवन की आधारशिला है। सुदेव, सुगुरु और सुधर्म के प्रति दृढ़ श्रद्धा रखते हुए द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की अपेक्षा से धर्म को समझना चाहिए। अनेकांत हमें सत्य को व्यापक दृष्टि से देखने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि विभिन्न जैन परंपराओं की आचार-पद्धतियों में भिन्नता हो सकती है, लेकिन सभी जैन साधु-साध्वियों के प्रति सम्मान रखना चाहिए। किसी के बाहरी आचार को देखकर अपने मन में संयम के प्रति अरुचि नहीं आने देनी चाहिए, बल्कि अपने संयम भाव को और दृढ़ करना चाहिए।
गुरुदेव ने पुष्पचूलिका एवं भूता आर्या के प्रसंग से समझाया कि साधु-साध्वी के जीवन में आचार संबंधी कठिनाइयां आ सकती हैं, लेकिन इससे संयम की महत्ता कम नहीं होती। उन्होंने जैन समाज में संप्रदायगत मतभेद से बचकर परस्पर सम्मान, समन्वय और सौहार्द बनाए रखने का आह्वान किया।
पूज्य श्री जयधुरंधरमुनिजी म.सा. ने मान कषाय और ऐश्वर्य मद से बचने की प्रेरणा देते हुए कहा कि विनय उत्थान का मार्ग है, जबकि अहंकार पतन का कारण बनता है। ताड़ के वृक्ष और घास के दृष्टांत से उन्होंने बताया कि विनम्रता व्यक्ति को स्थिर बनाती है। राजा दशार्णभद्र के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने कहा कि प्रभु दर्शन में भी यदि ऐश्वर्य प्रदर्शन का भाव जुड़ जाए तो भक्ति में विकार आ जाता है। इंद्र के दिव्य वैभव को देखकर राजा को अपने अहंकार का बोध हुआ और उन्होंने राजसी वैभव त्यागकर संयम स्वीकार किया। मुनिश्री ने कहा कि प्रभु भक्ति में प्रदर्शन नहीं, निश्छल भाव और विनम्रता आवश्यक है।
आचार्य श्री जयमलजी म.सा. कृत “जीवा बयांलिसी” काव्य रचना पर आधारित प्रवचन शृंखला के अंतर्गत पूज्य श्री जयपुरंदरमुनिजी म.सा. ने कहा कि हर भव्य आत्मा में परमात्मा बनने की क्षमता है, अंतर केवल कर्मों के आवरण का है। जैसे पारस पत्थर लोहे को सोना बना सकता है, लेकिन जंग की परत हटाना आवश्यक है, वैसे ही तप, संयम और सम्यक साधना से कर्मों का आवरण हटाने पर आत्मा का शुद्ध स्वरूप प्रकट होता है। उन्होंने निगोद से मनुष्य भव और मोक्ष तक जीव की क्रमिक यात्रा समझाते हुए कहा कि दुर्लभ मनुष्य भव को सांसारिक भोगों में न गंवाकर जिनवाणी, सम्यक्त्व और आत्मशुद्धि की साधना में लगाना चाहिए।
दिनांक 15 अगस्त और 16 अगस्त को डॉ. श्री पदमचन्द्रजी म.सा. द्वारा “सती गंगा” पर ह्रदयस्पर्शी, ओजस्वी एवं विशेष प्रवचन होंगे। शनिवार कों गोचरी दया का आयोजन भी रखा गया है। 16 सती साधना भी गतिशील है। आज की धर्मसभा में चेन्नई, सिकन्दराबाद, मुद्गगल, सिन्दनूर आदि क्षेत्रों से अनेक दर्शनार्थी उपस्थित थे। कर्नाटक स्वाध्याय का पंच दिवसीय प्रशीक्षण शिविर सम्पन हुआ। अध्यक्ष किशनलाल कोठारी ने स्वागत किया, मंत्री चन्द्रप्रकाश मुथा ने संचालन किया और कार्याध्यक्ष सुनील गादिया ने जानकारी दी।
संयम से विमुख न हों, सभी जैन साधु-साध्वियों के प्रति रखें सम्मान – पूज्य गुरुदेव डॉ. श्री पदमचन्द्रजी म.सा.

