मुनि कमल कुमार।।
इस अवसर्पिणी काल के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभ हुए।उनके मात-पिता का नाम मरूदेवा और नाभि था। भगवान का जब जन्म हुआ उस समय कल्पवृक्षों ने फल देने बन्द कर दिये, जिससे लोगों की भोजन-पानी की भयंकर समस्या हो गई औऱ भोजन के अभाव में आपस में छीना-झपटी होने लगी, अत्याचार बढ़ने लगे, लोगों के आजीविका का समस्या बढ़ने लगी।
लोग राजा नाभि से समस्या का समाधान पाने लगे,नाभि ने अपना दायित्व ऋषभ को सौंप दिया। ऋषभ ने समस्या का समाधान देते हुए आसि, मसि कृषि का उपदेश दिया। लोगों ने इन तीनों बिंदुओं पर अपना ध्यान केंद्रित किया औऱ समस्याओं का समाधान होने लगा। जब कोई नई समस्या होती तो ऋषभ के चरणों मे पहुंचते, यह क्रम निरन्तर चलता रहता। एक बार लोगों ने कहा कृषि करने से अनाज तो पैदा हो गया लेकिन उसको कैसे प्राप्त करें। तब उन्होनें कहा फसल की कटाई कर उसकी ढेरी करके पशुओं को उस पर चलाओ जिससे अनाज औऱ कचरा अलग-अलग हो जाएगा। लोगों ने देखा अगर पशु ही चर जाएंगे तो हम क्या खाएंगे ? ऋषभ के पास में जब लोग समस्या लेकर गये तब उन्हें समस्या का समाधान देते हुए कहा कि पशुओं के मुंह पर छींकी बांध दी जाये तो समाधान हो सकता है। लोगों ने जब पशुओं के छींकी बांधी तब देखा कि अब हमारी समस्याओं का समाधान हो गया। अनाज और तुड़ी अलग-अलग हो गये, परन्तु पशुओं के चारे की समस्या हो गई। लोगो ने ऋषभ के चरणों मे पुनः समस्या रखी तब ऋषभ ने कहा छींकी खोल दी क्या ? लोगों ने कहा खोली नहीं। ऋषभ ने कहा कि उसे खोल दो। ज्यों ही छींकी खोली पशुओं ने राहत महसूस की औऱ चारा-पानी को पूर्ववत व्यवस्थित करने लग गये। वह छींकी बारह घण्टे बन्दे रहने के कारण ऋषभ के 12 महीनों की अंतराय पड़ गई। चैत्र कृष्णा अष्टमी को भगवान ऋषभ दीक्षित हुए और वैशाख शुक्ला तृतिया तक उन्हें भी उस अन्तराय के कारण प्रासुक आहार-पानी का योग नही मिला। ऋषभ जब भिक्षा लेने जाते तब लोग उन्हें हाथी-घोड़े हीरे-पन्ने की भेंट देते, ऋषभ उन्हें स्वीकार नही करते। यों करते-करते बारह महिने दस दिन बीत गए आहार पानी का योग नही मिला, भगवान के पौत्र सोमप्रभ के पुत्र श्रेयांस को मेरु सिंचन का स्वप्न आया और उस स्वप्न के अनुसार सोचा, ऋषभ से बढ़ कर मेरु कौन सा होगा ? राज्य में इक्षु घट की भेंट आई हुई थी, श्रेयांस ने ऋषभ को गोचरी की याचना की औऱ भगवान ने देखा यह प्रासुक आहार मेरे लिये कल्पनीय है, उन्होंने उस इक्षुरस को ग्रहण किया, भगवान के पारणा होते ही देवों ने भी खुशी मनाई, अहोदानं अहोदानं की ध्वनि हुई, तब से वैशाख शुक्ला तीज को अक्षय तृतिया के रूप में मनाया जाता है। और काफी लोग चैत बदि अष्टमी भगवान ऋषभ के दीक्षा दिवस के दिन वर्षीतप प्रारम्भ करके वैशाख शुक्ला तृतिया के दिन इसका पारणा करते हैं। इस दिन गृहस्थ लोग विवाह-शादी, दुकान-मकान संस्थान का मुहर्त भी करते हैं, इसे अपूछ शुभ दिन मानते हैं। तेरापंथ धर्म संघ में भी यह वर्षीतप का क्रम आचार्य श्री तुलसी के समय से निर्बाध गति से चल रहा है। इस बार दक्षिण भारत के इरोड़ क्षेत्र में अणुव्रत अनुशास्ता महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में मनाया जा रहा है। सैकड़ों वर्षीतप वाले श्री चरणों मे तप की संपूर्ति के साथ अगले वर्ष का भी प्रत्याख्यान (संकल्प) करते हैं।
जैन धर्म मे अक्षय तृतीया का महत्व-मुनि कमलकुमार

