-बेंगलुरु महानगर अभी दूर, किन्तु बेंगलुरु जिले की सीमा में आचार्यश्री महाश्रमण का हुआ मंगल प्रवेश
-लगभग साढ़े सात किलोमीटर का विहार कर अहिंसा यात्रा पहुंची मयलापुरा
-साक्षरिका विद्या वर्षिणी स्कूल में पधारे महातपस्वी महाश्रमण
-थोड़े के लिए बहुत को न गंवाने की आचार्यश्री ने दी पावन प्रेरणा
13.06.2019 मयलापुरा, बेंगलुरु (कर्नाटक): कर्नाटक की धरती पर पहली बार अपनी अहिंसा यात्रा के साथ गतिमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, महातपस्वी, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी धीरे-धीरे वर्ष 2019 के चतुर्मास के लिए भारत के एक और बड़े महानगर बेंगलुरु की अग्रसर हो रहे हैं। अपनी धवल सेना के साथ आचार्यश्री जैसे-जैसे बेंगलुरु से निकट होते जा रहे हैं वैसे-वैसे बेंगलुवासियों सहित कर्नाटक के सभी श्रद्धालुओं का उत्साह बढ़ता जा रहा है। दिन प्रतिदिन आचार्यश्री के साथ विहार के दौरान विहार करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ती जा रही है। लोग अपने-अपने वाहनों के माध्यम से सूर्योदय से पूर्व ही पहुंच जा रहे हैं। वर्षों तक अपने आराध्य की प्रतीक्षा करने वाले श्रद्धालु सौभाग्य से प्राप्त इस सुअवसर का अपने-अपने ढंग से पूर्ण लाभ लेने का प्रयास कर रहे हैं।
कर्नाटकवासियों को सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति की प्रेरणा प्रदान करने वाले शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को तवरेकेरे के सरकारी उच्च प्राथमिक विद्यालय से मंगल प्रस्थान किया। आज भी प्रातः से ही बादलों का आसमान में आवागमन लगा हुआ था। लगातार चलने वाली हवा शीतलता को और बढ़ा रही थी। हालांकि आचार्यश्री का कोलार जिले से बेंगलुरु जिले की सीमा में प्रवेश तो बुधवार को ही हो गया था, किन्तु गुरुवार को आचार्यश्री ने बेंगलुरु जिले की अपना विहार आरम्भ किया। इस प्रकार बेंगलुरु महानगर भले ही अभी दूर था, किन्तु बेंगलुरु जिले की सीमा आचार्यश्री महाश्रमणजी के ज्योतिचरणों का स्पर्श पाकर आनंदित हो उठी थी। महातपस्वी के चरणरज को पाकर आनंदित धरा प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण नजर आ रही थी। राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 75 पर लगभग साढे सात किलोमीटर का विहार कर मयलापुरा स्थित साक्षरिका विद्या वर्षिणी स्कूल में पधारे।
स्कूल परिसर में आयोजित मंगल प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित श्रद्धालुओं को आचार्यश्री ने पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि थोड़े के लिए बहुत को गंवा देना आदमी के लिए नासमझी की बात होती है। आचार्यश्री ने एक कथानक के माध्यम से लोगों को उत्प्रेरित करते हुए कहा कि कोई साधु जो तपस्या करता है, साधना करता है, वह कभी विचलित होकर सांसारिक सुख की के लिए साधुपन को छोड़ देता है तो वह क्षणिक सुख के लिए साधुता रूपी हीरे का परित्याग कर देता है। उसी प्रकार आदमी मोहग्रस्त होकर भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए अनंत आत्मिक सुखों को गंवा देता है। आदमी को परम की प्राप्ति अथवा मोक्ष की प्राप्ति के लिए भौतिक सुखों का परित्याग करने का प्रयास करना चाहिए। परिवार हित के लिए व्यक्ति हित, गांव हित के लिए एक परिवार हित और राष्ट्रहित के लिए गांव हित को छोड़ देना चाहिए। बड़े हित के लिए छोटे को छोड़ देने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के पश्चात् स्कूल के प्रिंसिपल श्री यशवंतजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने समुपस्थित अन्य ग्रामीणों को अंग्रेजी भाषा में प्रेरणा प्रदान कर अहिंसा यात्रा की संकल्पत्रयी ग्रहण करवाई।

