लगभग 11 किमी विहार कर शांतिदूत पहुंचे सांगली, श्रदालुओं ने किया आपने आराध्य का भावभीना स्वागत
06-03-2020, शुक्रवार, सांगली, महाराष्ट्र। जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के 11वें अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज प्रातः तेरापंथ भवन जयसिंगपुर से मंगल विहार किया। शांतिदूत के दो दिवसीय शासन प्रभावक प्रवास से सभी जयसिंहपुर वासी अपने आप को सौभाग्यशाली महसूस कर रहे थे। विहार के दौरान अनेक श्रद्धालुओं की भक्ति भावना को पूर्ण करते हुए आचार्य श्री ने पगलिया, मांगलिक एवं आशीर्वाद प्रदान किया। आचार्य श्री तुलसी वर्ल्ड बैंक में पूज्य गुरुदेव ने पधार कर जानकारी प्राप्त की एवं प्रबंधकों को आशीष प्रदान किया। सांगली की ओर से प्रस्थित ज्योतिचरण के चरण जैसे-जैसे गंतव्य के निकट पहुंच रहे थे श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती जा रही थी। आदिसागर जैन मंदिर एवं श्री प्रेमचंद घोड़ावत डायग्नोस्टिक सेंटर में अपने चरण रखते हुए पूज्य आचार्य श्री महाश्रमण का सांगली के श्री राजेंद्र घोड़ावत के निवास पर पदार्पण हुआ। सकल श्रावक समाज ने हर्षोल्लास के साथ जूलूस से अपने आराध्य का अभिनंदन किया।
मुख्य प्रवचन सभा में अमृतवाणी की वर्षा करते हुए पूज्य श्री महाश्रमण ने कहा– दुनिया में वही सुखी रह सकता है जो अपने आपका अपनी आत्मा का दमन करता है। खुद पर संयम करने वाला, अनुशासन करने वाला यहां भी सुखी और आगे भी सुखी रहता है। अपने पर अनुशासन है तो वह दूसरों को भी अनुशासन में रख सकता है। खुद पर कंट्रोल नहीं तो दूसरों पर अनुशासन करने में असफलता मिल सकती है। संगठन में, परिवार में अनुशासन आवश्यक है।
आचार्य श्री ने आगे कहा कि पारिवारिक जीवन में सहिष्णुता नहीं, अनुशासन नहीं तो दिक्कत आ जाती है। कभी-कभी तो मुखिया को भी झुकना पड़ता है। परिवार को व्यवस्थित रखने के लिए बड़ों को भी झुकना पड़ जाता है। बड़ों को बड़प्पन दिखाना चाहिए। पारिवारिक जीवन अनुशासन पूर्ण रहे। बलिदान, त्याग, परोटने की कला हो तो परिवार, समाज अच्छा रह सकता है। जहां सारे नेता बनने का प्रयास करें तो क्या होगा। व्यक्ति अपने मन, वाणी एवं काया पर अनुशासन रखने का प्रयास करें तो वह सुखी रह सकता है।
कार्यक्रम में अभिवंदना देते हुए सांगली तेरापंथ सभा अध्यक्ष श्री राजेंद्र घोड़ावत, प्रणव घोड़ावत, प्रतीक बरडिया में अपने विचार रखें। तेरापंथ समाज ने सामूहिक गीत की प्रस्तुति दी।
इस अवसर पर जैन विश्व भारती द्वारा प्रकाशित आचार्य भिक्षु आख्यान साहित्य का तीसरा व चौथा भाग गुरु चरणों में श्री राजेंद्र घोड़ावत एवं श्री संजय घोडावत ने भेंट किया।

