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आशंकाएं, और उम्मीद का गलियारा

Last updated: November 8, 2019 11:07 am
Surabhi Saloni
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8 Min Read
File Photo
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हरजिंदर।।
तारीख समान है, इसलिए करतारपुर गलियारे को खोले जाने की तुलना बर्लिन की दीवार गिराए जाने से की जा रही है। पाकिस्तान करतारपुर गलियारे को भारत के सिख श्रद्धालुओं के लिए 9 नवंबर को खोल रहा है, और पूर्वी जर्मनी व पश्चिम जर्मनी के बीच बर्लिन में दशकों तक बुलंद रही दीवार भी 9 नवंबर को ही गिराई गई थी। लेकिन दुनिया के दो दूर-दराज महाद्वीपों में कैलेंडर की एक ही तारीख को हुई इन दोनों घटनाओं के बीच 30 साल का अंतर ही नहीं है, बल्कि ढेर  सारे दूसरे फर्क भी हैं। बर्लिन की दीवार उस मानसिकता, उस विचारधारा और शासन-व्यवस्था में बिखराव के बाद टूटी थी, जिसने जर्मनी को दो हिस्सों में बांट दिया था। वहां बहुत सारे पूर्वाग्रह दीवार गिरने से काफी पहले ही टूटने लगे थे और दीवार टूटने के बाद जर्मनी को फिर एक हो जाना था। फिर वह दीवार न तो किसी शासन-व्यवस्था द्वारा तोड़ी गई थी, न उसका टूटना किसी समझौते का नतीजा था, उसे तो उन उकताए हुए लोगों ने तोड़ दिया था, जिन्हें इस दीवार की निरर्थकता न जाने कब से सता रही थी। वह एक तरह की क्रांति थी, पर फिलहाल मुद्दा करतारपुर साहिब गलियारा है।   बर्लिन में जो 1989 में हुआ, करतारपुर में वैसा कुछ नहीं होने जा रहा। बेशक, सीमा पार करके पाकिस्तान में जाने और मत्था टेककर वापस आ जाने का रास्ता जरूर खुला है, लेकिन दोनों देशों के बीच शक-शुबहे का समीकरण इतने भर से नहीं बदलने वाला। गलियारे का खुलना हमें यह मानने का कोई कारण नहीं देता कि इस एक तारीख के बाद पाकिस्तान भारत की नींद हराम करना बंद कर देगा। गौर से देखें, तो जिस दौरान करतारपुर गलियारे की तैयारियों की खबरें आ रही थीं, उसी दौरान पाकिस्तान में युद्धोन्माद काफी तेजी से बढ़ा है, खासकर कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से। पाकिस्तान के फौजी जनरलों से लेकर वहां के राजनेता और मंत्री तक इस आग में घी डालने में जुटे हैं। भारत में भी जवाबी गरमी दिखी है, भले ही वह उतनी तीखी न हो।
इस दौरान पाकिस्तान सरकार की तरफ से करतारपुर साहिब गलियारे का एक वीडियो भी आया है, जिसमें खालिस्तान का पोस्टर और कुछ उन लोगों की तस्वीरें हैं, जिन्हें पूरा भारत आतंकवादी मानता है। और पंजाब तो अतीत का एक अध्याय मानकर उसे भूल भी चुका है। ठीक यहीं पर इसे भी याद रखना होगा कि जब करतारपुर साहिब परियोजना का उद्घाटन हुआ था, तब भी वहां एक अलगाववादी सिख नेता की न सिर्फ मौजूदगी थी, बल्कि उसे खासा महत्व भी दिया गया था। इस सबसे जो संदेह उपजते हैं, वे काफी बडे़ हैं और ढेर सारे हैं। यह डर तो शुरू से ही व्यक्त किया जा रहा है कि कहीं इस गलियारे के पीछे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की योजना पंजाब में अलगाववाद के बीज को फिर से पनपाने की तो नहीं है। यह आशंका खुफिया एजेंसियों को भी है और पंजाब के मुख्यमंत्री अर्मंरदर सिंह को भी। जाहिर है, ऐसे में यह गलियारा हमारी आशंकाओं और डर को भेदने का नहीं, उन्हें पालने-पोसने का काम ही करेगा।
भारत और पाकिस्तान के विभाजन की हकीकत काफी उलझी हुई है। दोनों के बीच खिंची विभाजन रेखा सिर्फ दो देशों को ही अलग नहीं करती, बल्कि वह दिलों के बीच भी खिंची है और श्रद्धाओं के बीच भी। सिखों की आस्था के बहुत सारे केंद्र अब उनके लिए एक अलग मुल्क का हिस्सा हैं, जहां मत्था टेकने के लिए पहुंचना ही एक टेढ़ी खीर है। देश के किसी भी गुरुद्वारे में जब भी अरदास होती है, तो पाकिस्तान के गुरुद्वारों को यह कहकर याद किया जाता है- जिना तो सिंहा नु विछोड़िया गया।  सिर्फ ऐतिहासिक गुरुद्वारे नहीं, चकवाल के कटासराज मंदिर जैसे तीर्थ स्थलों को भी हम ऐसे ही स्थानों में गिन सकते हैं। इन गुरुद्वारों में करतारपुर साहिब इसलिए अलग है कि यह सीमा से महज चार किलोमीटर दूर है। अभी तक सिख श्रद्धालु इसके दर्शन भारत स्थित डेरा बाबा नानक से दूरबीन के माध्यम से करते थे। अब नई व्यवस्था ने उन्हें सीमा पार करके गुरुद्वारे तक जाने की इजाजत दे दी है।
करतारपुर साहिब ऐसा अकेला उदाहरण नहीं है। ठीक इसी तरह की एक जगह अमृतसर जिले में रहमतशाह बुर्जीवाला पीर का मजार है, जो ठीक दोनों देशों की सीमा पर भारत की तरफ स्थित है, जबकि ज्यादातर श्रद्धालु सीमा के उस पार पाकिस्तान की तरफ हैं। हर साल जब यहां उर्स होता है, तो कंटीली तारों के उस पार श्रद्धालु जमा हो जाते हैं, और मेला दोनों तरफ लग जाता है। मजार पर चढ़ाने के लिए जो लोग फूल-चादर लाते हैं, वे उसे सीमा सुरक्षा बल को सौंप देते हैं और सीमा सुरक्षा बल वाले उनमें प्रसाद व शरबत का वितरण करते हैं। विभाजन ने इस क्षेत्र के लोगों को इबादत की नई रवायत दे दी है। तकरीबन ऐसा ही अमृतसर के खेमकरण में बाबा ब्रह्म के मजार में होता है और जम्मू-कश्मीर के सांबा सेक्टर में इसी तरह सीमा पर ही बाबा चमलियाल की दरगाह है। जाहिर है, करतारपुर गलियारा खुलने के बाद इन जगहों के श्रद्धालुओं में भी उम्मीद की एक किरण जगी होगी।
भारत और पाकिस्तान के बीच का विभाजन जितना पुराना है, उतनी ही पुरानी दोनों देशों के बीच की रंजिश भी है, और उतना ही पुराना दोनों देशों के बीच दोस्ती की उम्मीद बांधने का सिलसिला भी है। दोनों ही देश अगर बहुत छोटी-छोटी चीजों पर उलझे रहते हैं, तो बहुत छोटी-छोटी चीजों से बहुत बड़ी उम्मीद भी अक्सर ही बांध ली जाती है। कई बार तो यह भी लगने लगता है कि सिर्फ हॉकी या क्रिकेट ही हमें दोस्ती की ओर ले जाएंगे। लेकिन यह सच है कि दोनों की दुश्मनी का एक इतिहास है, इसे खत्म करने का अर्थ एक नया इतिहास बनाना होगा और इतिहास बनाना कभी आसान नहीं होता। करतारपुर साहिब गलियारे ने पाकिस्तान को इसकी शुरुआत का एक मौका दिया था। इसके जरिए वह अपनी नेकनीयती की एक झलक भारत को दिखा सकता था। लेकिन पिछले कुछ दिनों की घटनाए बताती हैं कि पाकिस्तान ने यह मौका गंवा दिया है। हालांकि यह उपलब्धि भी कम नहीं है कि अब भारत के सिख मत्था टेकने करतारपुर साहिब जा सकेंगे। फिलहाल का सच सिर्फ इतना ही है, जो हमें इससे बड़ी किसी उम्मीद की गुंजाइश नहीं देता।

Thanks:https:www.livehindustan.com

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