मुंबई। आचार्य रविशेखरसूरीश्वरजी म. सा. की निश्रा में ठाकुरद्वार में प्रवचन में आज ललितशेखरविजयजी म. सा. ने ‘चौथी शरण धर्म की’ और आज श्रावण सुदि 6 श्री नेमिनाथ भगवान के दीक्षा कल्याणक के बारे में बताया।
धर्म की व्याख्या बदलती रहती हैं, संसारी आत्मा के लिए अहिंसा (जयणा), श्रावक के लिए तप-जप आदि क्रिया, साधु के लिए तीर्थंकर आज्ञा मानना और केवली भगवंतों के लिए वस्तु का स्वभाव ही धर्म हैं। संसारी आत्मा सुख-शांति के लिए, श्रावक-श्राविका श्रावक धर्म के लिए, साधु साधना के लिए और समकीती आत्मा श्रद्धा को टिकाए रखने के लिए पुरुषार्थ करते हैं। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ये 4 पुरुषार्थ हैं।
नेमिनाथ भगवान ने 1000 के साथ द्वारिका नगरी में दीक्षा अंगीकार की थी, तीर्थंकरों के पांचों कल्याणक सभी आत्माओं के लिए कल्याणकारी होते हैं, ऐसे कल्याणक वाले दिनों में विशेष धर्म आराधना करने से उच्च कोटि के पुण्य का उपार्जन होता हैं।
किशन सिंघवी और कुणाल शाह के अनुसार मंगलवार को नेमानी वाड़ी को अपने ओजस्वी वाणी से पावन कर रहे पू. आचार्य भगवंत श्री रविशेखरसूरीश्वरजी म. सा. के सानिध्य में उपस्थित होकर भंवरलालजी पारसमल सालेचा भोरड़ा परिवार कल्याण द्वारा 2020 में पवित्र पालीताना में उपध्यान तप की निश्रा हेतु विनंती किया।
मुम्बई मेवाड़ संघ के अध्यक्ष किशनलाल परमार ने कहा कि आचार्य श्री की वाणी में बहुत प्रभाव है। जिनको इनका आशीर्वाद मिलता है वो तर जाता हैं। वहीं इस मौके पर ठाकुरद्वार संघ के पदाधिकारी और समर्पण ग्रुप के कार्यकर्ता के अलावा सैकड़ों श्रावक-श्राविकाएं भी मौजूद रहे।
संसारी आत्मा के लिए अहिंसा, श्रावक के लिए तप-जप: ललितशेखरविजयजी म. सा.

