– मीनाक्षी मुकेश सिंघवी –
आज भी हमारे समाज में पहल राखी को शोक के लिए मनाया जा रहा है…क्या यह उचित है?
घर मे किसी सदस्य की मृत्यु के बाद हम शोक करते है, उसके बाद शादी ,त्योहार भी मनाते है, जैसे ही राखी का त्योहार आता है,फिर से परिवार शोकाकुल में लाया जाता है, पहल राखी मनाकर।
यदि नही मनाये तो भी समाज मे बाते होती है,इतनी उम्र कर गये, घर के बड़े थे।एक राखी न मनाये तो क्या जाता?लेकिन राखी पर शोक त्योहार क्यों मनाये, इसके वजह से कितने भाई बहन राखी का त्योहार साथ में नही मनाते। किसी के न होने का दुःख हमे जिंदगी भर रहता है,इसलिये इसमे बदलाव आना बहुत जरूरी है।
मृत्यु के बाद आने वाला पहला त्योहार ही पहल त्योहार हो, और सिर्फ परिवार तक हो,जिंदगी बहुत छोटी है,पता नही अगले साल त्योहार में रहे या न रहे।
इसकी शुरवात हमे हमारे घर से करनी है,यदि आप इस बदलाव को अपने घर से शुरू करेंगे तो आपके घर कोई शोक की राखी नही लायेगा।परिवार को खुश देख कर जाने वाले की आत्मा को भी शांति मिलेगी।
न शोक की राखी कही लेकर जाये और न शोक की राखी स्वीकार करे। यह बदलाव की बहिनो का प्रयास ओर समाज सुधार का सुझाव है।
जब घर मे होगा बदलाव तो बदलेगा समाज
बदलाव से जुडी बहिनो की आवाज मीनाक्षी मुकेश सिंघवी,मन्जू सम्पत कोठारी,निर्मला राजू लोढ़ा,सम्पूर्ण पदमावती महिला मंडल मजेरा और मेवाड समाज से जुडी बहिनो ने एक साथ होकर समाज मे आवश्यक बदलाव की पहल की है, “शोक की राखी” यानी पहल राखी की प्रथा बन्द होनी चाहिए।
“बदलाव का प्रयास”

