मुंबई। आ. रविशेखरसूरीश्वरजी म. सा. की निश्रा में ठाकुरद्वार में नेमानी वाड़ी के प्रांगण में आज प्रवचन में ललितशेखरविजयजी म. सा. ने ‘महाविदेह क्षेत्र’ की व्याख्या की।
महाविदेह क्षेत्र में भूतकाल, भविष्यकाल और वर्तमान में विचर रहे सभी तीर्थंकर परमात्माओं का निर्वाण कल्याणक दिवस आज यानी श्रावण सुदि 3 को ही होता हैं। जम्बूद्वीप के उत्तर में ऐरावत क्षेत्र, दक्षिण में भरत क्षेत्र और मध्य में मेरु पर्वत के चारों तरफ महाविदेह क्षेत्र हैं, ऐसे 5 महाविदेह क्षेत्र हैं, हर क्षेत्र में 4 तीर्थंकर होते हैं, वहां 32 विजया होते हैं, 8वीं विजया का नाम पुष्कलावती विजया हैं और उसके पुंडरीगिणी नगरी में विराजमान हैं सीमंधर स्वामी और वो भरत क्षेत्र से सबसे नजदीक हैं। भरत क्षेत्र में पांचवां आरा चल रहा हैं जिसमें मोक्ष के द्वार बंद हो चुके हैं, लगभग 84 हज़ार साल के लिए बंद रहेगा, महाविदेह क्षेत्र में हमेशा चौथा आरा ही रहता हैं, वहां तीर्थंकर हमेशा मौजूद रहते हैं, और वहां मोक्ष का द्वार कभी बंद नहीं होता, इसलिए मोक्ष जाने के लिए फिलहाल हमें महाविदेह क्षेत्र में जन्म लेना होगा और उसी के लिए हम रोज सुबह राई प्रतिकमण में सबसे नजदीकी तीर्थंकर सीमंधर स्वामी का चैत्यवंदन पहले करते हैं और बाद में शत्रुंजय महातीर्थ का करते हैं।
महाविदेह क्षेत्र के सभी 20 तीर्थंकरों का आयुष्य 84 लाख पूर्व होता हैं जिसमें 83 लाख पूर्व छद्मस्त अवस्था में और 1 लाख पूर्व साधु अवस्था में रहते हैं, 500 धनुष्य और कंचनवर्णी काया होती हैं, धोरी (वृषभ) लांछन होता हैं। सभी तीर्थंकरों के परिवार में 84 गणधर होते हैं (कुल 1680), 10 लाख केवली भगवंत (कुल 2 करोड़), 1 अरब साधु-साध्वी (कुल 20 अरब), 9 अरब श्रावक-श्राविका (कुल 180 अरब)। तीर्थंकर रोज समवसरण में अर्ध-मागधी भाषा और मालकोष राग में देशना देते हैं, देशना के प्रभाव से 6 महीनें तक भूख-प्यास नहीं लगती। परमात्मा के समक्ष 12 पर्षदा लगती हैं, परमात्मा 34 अतिशयों से युक्त होते हैं (4 अतिशय जन्म से, 19 अतिशय देव के और केवलज्ञान मिलने के बाद 11 अतिशय), खून और मांस दोनों सफेद होते हैं, श्वासोश्वास में कमल के फूल की सुगंध रहती हैं, आहार-निहार किसी को दिखाई नहीं देते, निरोगी शरीर, वाणी में 35 गुण होते हैं, भवी जीवों को प्रतिबोध करते हैं, चंद्रमा से भी अधिक शीतल होते हैं, रूप देखकर सब मोहित होते हैं। तीर्थंकरों के कल्याणक के दिन नरक के जीवों को भी कुछ क्षण के लिए सुख प्राप्त होता हैं। वहीं ‘ऋषभ महा-विद्या तप’ के चौदवें दिन के एकासणे की भी व्यवस्था अच्छे से हुई।
किशन सिंघवी और कुणाल शाह के अनुसार ठाकुरद्वार संघ के पदाधिकारियों और समर्पण ग्रुप के कार्यकर्ताओं के अलावा बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविका उपस्थित थे।
ललितशेखरविजयजी म. सा. ने की ‘महाविदेह क्षेत्र’ की व्याख्या

