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Reading: व्रती और प्रतिमाधारी बनने की कामना रखे श्रावक : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
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व्रती और प्रतिमाधारी बनने की कामना रखे श्रावक : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

Last updated: March 8, 2026 12:05 pm
Surabhi Saloni
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4 Min Read
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Highlights
  • जैन श्वेतांबर तेरापंथी महासभा की दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला का शुभारंभ
  • ध्यान के संदर्भ में गुरुदेव ने प्रदत्त की प्रेरणा

लाडनूं, डीडवाना-कुचामन (राजस्थान)। योगक्षेम वर्ष के अंतर्गत जैन विश्व भारती, लाडनूं में युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में अध्यात्म का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। आज प्रातः काल गुरुदेव ने नगर में पधारकर अस्वस्थ श्रद्धालुओं को अपने मंगल दर्शन प्रदान कर उन्हें विशेष आध्यात्मिक संबल दिया। इसके पश्चात आयोजित मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में आचार्य श्री ने “अकेले ध्यान करो” के महत्वपूर्ण विषय पर उपस्थित विशाल जनमेदिनी को अपना पावन पाथेय प्रदान किया।
इसी अवसर पर गुरुदेव के मंगल सान्निध्य में दो दिवसीय ‘जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा’ की कार्यसमिति बैठक एवं प्रशिक्षण कार्यशाला का भी भव्य शुभारंभ हुआ। प्रातः काल तेरापंथी महासभा के अध्यक्ष श्री महेंद्र नाहटा, महामंत्री श्री विनोद बैद सहित कार्यसमिति सदस्यों ने आचार्यश्री के श्रीमुख से मंगलपाठ श्रवण किया। इसके साथ ही इन महत्वपूर्ण सत्रों की विधिवत शुरुआत हुई। धर्म संघ के इस अहम सांगठनिक मंथन में भाग लेने के लिए देश-विदेश के कोने-कोने से महासभा के कार्यसमिति सदस्य लाडनूं पहुंचे हुए हैं।
सुधर्मा सभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए गुरुदेव ने कहा – आगमों में श्रावक की चार भूमिकाएं बताई गई हैं, सुलभ बोधि, सम्यग् दृष्टि, व्रती और प्रतिमाधारी श्रावक। एक श्रावक को निरंतर यह चिंतन करना चाहिए कि मुझे केवल सुलभ बोधि ही नहीं, बल्कि व्रती और प्रतिमाधारी श्रावक बनना है। आचार्य श्री तुलसी ने वर्तमान संदर्भ में तीन अभिनव मनोरथों की चर्चा की है कि ‘कब मैं आवेश मुक्त बनूंगा, कब मैं अप्रामाणिकता मुक्त बनूंगा और कब मैं रूढ़ि मुक्त बनूंगा।’ आठ कर्मों में केवल मोहनीय कर्म ही है जो भटकाता है, इसलिए हमें अनंतानुबंधी कषायों से मुक्त होकर आवेश मुक्त बनने का अभ्यास करना चाहिए। साधु जीवन में स्वाध्याय और ध्यान का बहुत महत्व है।
साधु का जीवन मूलतः संवरमय होता है और संवर के बिना साधुत्व नहीं हो सकता। तपस्या (निर्जरा) से भी ज्यादा गरिमा वाला तत्व संवर है, क्योंकि संवर की साधना अच्छी है तो कर्मों को तो झड़ना ही पड़ेगा। साधु की दिनचर्या का एक ऐसा मॉडल होना चाहिए जिसमें आत्मोपकार, संघोपकार और जनोपकार का यथासंभव समावेश हो सके। इसी दिशा में 75 वर्ष की आयु पार कर चुके चारित्र आत्माओं के लिए ‘सुप्रिधान साधना’ का एक विशेष प्रारूप तैयार किया गया है, जिसमें वे इच्छा होने पर अग्रणी का दायित्व छोड़कर, खान-पान और जनसंपर्क को सीमित कर अपनी प्रकृष्ट साधना, स्वाध्याय और कषाय मुक्ति में अधिक समय लगा सकें।

गुरुदेव ने आगे कहा कि आगम में ध्यान का निर्देश प्राप्त होता है और आज का विषय भी है ‘अकेले ध्यान करो’। स्वाध्याय में तो समूह की आवश्यकता हो सकती है, पढ़ाने वाला और पढ़ने वाले दोनों चाहिए, परंतु ध्यान तो अकेला ही किया जा सकता है। शरीर को स्थिर करना, चित्त को एकाग्र करना या निर्विचारता में जाना, यह आदमी अकेले बैठकर कर सकता है। रात को नींद टूट गई, दो-तीन बजे उठकर अपना ध्यान कर लो, जप कर लो।

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