उल्हासनगर। महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की विदुषी सुशिष्या साध्वीश्री निर्वाणश्रीजी आदि थाणा-६ के पावन सान्निध्य में उल्लासनगर में *’तेरापंथ मेरापंथ’* कार्यशाला का सफल समायोजन हुआ। जैन श्वेतांबर तेरापंथ महासभा के निर्देशन में समायोजित इस कार्यशाला को संबोधित करते हुए विदुषी साध्वीश्री निर्वाणश्रीजी ने कहा- आचार्य भिक्षु के दर्शन को स्वयं गहराई से समझे और आने वाली पीढ़ी को भी समझाएं। ‘हे प्रभों! यह तेरापंथ’ केवल एक उद्घोष नहीं है, इसके हार्द को समझना जरूरी है। आचार्य भिक्षु के दर्शन को पढ़ें ,उसे भीतर में ले जाने का प्रयास करें ।
प्रबुद्ध साध्वीश्री डा.योगाक्षेमप्रभाजी ने अपने प्रेरक वक्तव्य में कहा- जैन धर्म शासन के नभ में तेरापंथ का उदय एक तेजस्वी सूर्य के उदय की भांति था। आचार्य भिक्षु ने आचार, विचार, और व्यवहार की त्रिपदी के आधार पर एक नई धर्मक्रांति की। साध्वी श्री लावण्यप्रभाजी , साध्वीश्री कुंदनयशाजी, साध्वीश्री मुदितप्रभाजी, साध्वी श्री मधुरप्रभाजी ने समवेत स्वरों में मधुर गीत प्रस्तुत किया।प्रशिक्षक रतनजी सियाल( प्रवक्ता उपासक) ने तेरापंथ की दान,दया ,मूर्तिपूजा आदि सिद्धांतों का विशेष प्रशिक्षण दिया। उन्होंने तेरापंथ के मुलभूत सिद्धांतों के संदर्भ में आचार्य भिक्षु के व्यक्तित्व की झांकी प्रस्तुत की।
कार्यशाला का शुभारंभ उल्हासनगर महिला मंडल के मंगल संगान से हुआ। उल्हासनगर क्षेत्र के प्रभारी श्री सुरेश बैद ने प्रासंगिक अभिव्यक्ति दी । स्थानीय तेरापंथ सभा के उत्साही अध्यक्ष जीतुभाई थडाणी ने समागत अतिथियों का स्वागत किया। श्रीमती वंदना जैन ने अपनी खुशी प्रकट करते हुए सभा परिवार को बधाई दी। कार्यशाला अत्यंत उल्लासमय वातावरण में परिसंपन्न हुई।

