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Mumbai / Maharshtra

तकनीक से दूरी या इंसानियत से दूरी?

Last updated: February 13, 2026 11:24 am
Surabhi Saloni
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4 Min Read
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Highlights
  • ”मुंबई के बाज़ारों में हाथगाड़ियाँ और हमारी संवेदनहीनता: अहिंसा प्रेमियों से एक सवाल”

मुंबई। अहिंसा और जीवदया की बात करने वाले हम लोग क्या सच में अपनी ही कसौटी पर खरे उतर रहे हैं, जब आधुनिक तकनीकी युग में भी इंसानों से हाथगाड़ी पर भारी माल ढुलवाया जा रहा है? क्या यह मानवीय गरिमा के खिलाफ नहीं है कि जिस शहर में हम कुत्ते, बिल्ली और गायों की सेवा के लिए लाखों रुपये दान करने पर गर्व करते हैं, उसी शहर में अपनी दुकानों के सामने काम करने वाले हाथगाड़ी चालकों के लिए इलेक्ट्रॉनिक छोटे मालवाहक वाहन उपलब्ध कराने पर चुप्पी साध लेते हैं? क्या यह दोहरा मापदंड नहीं है कि जीवदया के नाम पर हम भावुक हो जाते हैं, लेकिन इंसान की मेहनत, पसीने और पीठ पर पड़ने वाले बोझ को देखने की संवेदनशीलता खो बैठते हैं?
क्या दुनिया के अधिकांश देशों में मानव से बोझा ढुलवाने की प्रथा खत्म हो जाने के बाद भी हमें यह सोचकर संतोष करना चाहिए कि “यह तो परंपरा है”? क्या यह सच नहीं कि आज पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे कुछ देशों को छोड़ दें तो कहीं भी इंसानों से इस तरह गाड़ी खिंचवाना सामान्य नहीं है-तो फिर क्या हम उनसे भी पीछे खड़े होकर खुद को सभ्य और करुणामय समाज कह सकते हैं? क्या हमें यह सवाल खुद से नहीं पूछना चाहिए कि जो समाज बैलगाड़ी या घोड़ा-गाड़ी की सवारी को अहिंसा के नाम पर पाप मानता है, वही समाज इंसानों से हाथगाड़ी खिंचवाकर किस नैतिक आधार पर खुद को करुणाशील घोषित करता है?
क्या अब वक्त नहीं आ गया है कि मुंबई जैसे आधुनिक महानगर में मानवीयता के मानकों को नए सिरे से परिभाषित किया जाए-जहां कामगारों के श्रम का सम्मान शब्दों से नहीं, बल्कि उनके लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और तकनीकी विकल्प उपलब्ध कराकर किया जाए? क्या व्यापारी समुदाय यह जिम्मेदारी नहीं ले सकता कि जिन हाथों से उसका कारोबार चलता है, उन्हीं हाथों को अमानवीय बोझ से मुक्त किया जाए? और अंत में, क्या हम सबको यह सवाल अपने भीतर नहीं उठाना चाहिए कि हमारी अहिंसा सिर्फ दान-पेटियों तक सीमित है, या सचमुच इंसान की गरिमा तक पहुंचती भी है? उन व्यापारी बंधुओं से एक सीधा-सा सवाल-जिन्होंने मानो खुद को अपग्रेड न करने की क़सम खा रखी है और आज भी टेक्नोलॉजी से दूरी बनाए हुए हैं: क्या कारोबार को आधुनिक बनाने की जिम्मेदारी सिर्फ मुनाफ़ा बढ़ाने तक सीमित है, या फिर जिन इंसानों की मेहनत से आपका व्यापार चलता है, उनके काम के तरीक़ों को भी समय के साथ सम्मानजनक और सुरक्षित बनाना आपकी नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती? क्या डिजिटल बिलिंग, ऑनलाइन पेमेंट और तेज़ लॉजिस्टिक्स अपनाने में आपको कोई आपत्ति नहीं, लेकिन माल ढोने के लिए आज भी इंसानों की पीठ पर बोझ डालना आपको “परंपरा” लगती है? क्या तकनीक से दूरी बनाना सच में सिद्धांत है, या बदलाव से बचने का बहाना-और इस बहाने की क़ीमत किसी और के शरीर और स्वाभिमान को चुकानी पड़ रही है?

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