मुंबई। आचार्य रविशेखरसूरीश्वरजी म. सा. की निश्रा में नेमानी वाड़ी, ठाकुरद्वार में प्रवचन के पूर्व, ज्ञान पूजा के 5 लाभार्थियों ने अमृत बिंदु ग्रंथ की ज्ञान पूजा की, उसके पश्चात अष्ट प्रकारी पूजा के लाभार्थियों ने पूजा की, बाद में अमृत बिंदु ग्रंथ वोहरने के लाभार्थियों ने प. पू. ललितशेखरविजयजी म. सा. को ग्रंथ वोहराया। तत्पश्चात प्रवचन में साहेबजी ने इस ग्रंथ की विशेषता बताते हुए फरमाया की इस ग्रंथ के रचयिता उपाध्याय यशोविजयजी महाराज ने इस ग्रंथ में 3 चीज़ों के बारे में बताया है मिथ्यात्व, मोह और अज्ञान।
ग्रंथ लिखना शुरू करने से पहले अरिहंत, गुरु और सरस्वती को नमस्कार करके मंगल करना, फिर ग्रंथ रचने का प्रयोजन नक्की करना, फिर ग्रंथ का संबंध जिनसे हो उनका चुनाव करना और अंत में ग्रंथ का विषय बनाना। साथ में ये भी बताया के किसी भी मंगल कार्य मे जो विघ्न या अंतराय आते है वो अहंकार के कारण और पिछले भव में हमने किसी के कार्यो में अंतराय किया होगा उस वजह से आते है। हम जिस चीज़ का अहंकार करते है वो चीज़ हमे पर भव में नही मिलती।
हर किसी ग्रंथ के रचयिता सिर्फ एक ही होता है पर श्रीपाल-मयणा रास के रचयिता दो थे, पहले 750 गाथा जो सरल गुजराती भाषा में बनाई गई है वो उपाध्याय विनयविजयजी महाराज ने बनाई और उनके देवलोक गमन के बाद पीछे की 250 गाथाये उपाध्याय यशोविजयजी महाराज ने बनाई जो कठिन भाषा में रची गयी । अमृत बिंदु ग्रंथ की विशेषता ये है कि ये ग्रंथ गुजराती और सरल भाषा में रचा गया है । आगे की श्रृंखला में प्रवचन इस मुख्य ग्रंथ पर आधारित होगा।
किशन सिंघवी के अनुसार प्रवचन में ठाकुरद्वार संघ के पदाधिकारियों में वसंत भाई, महेंद्र मंडोत, पंकज मेहता, देवराज पुनमिया, रसिक पालरेचा,चांदमल सिंघवी देवीलाल सिंघवी हस्तीमल सिंघवी लक्ष्मिलाल सिंघवी आदि मौजूद रहे और कार्यकारिणी मंडल के ललित जैन, चंदनमल संघवी, आदि मौजूद रहे और प्रवचन में 500 से ज्यादा श्रावक-श्राविकाएं भी मौजूद रहे।
ठाकुरद्वार में बह रही है धर्म-अध्यात्म की गंगा, आचार्य रविशेखरसूरीश्वरजी मसा. की निश्रा में हुए विविध पूजन

