नई दिल्ली: अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में वापस लेने को लेकर भारत और चीन की समान चिंताएं हैं। शुक्रवार को अफगानिस्तान के हालात पर भारत और चीन के बीच खास तौर पर विमर्श हुआ है। यह बातचीत विदेश सचिव विजय गोखले और चीन के विशेष दूत डेंग शियाजुन के बीच हुई। दोनो देशों के बीच इस बात को लेकर सहमति बनी है कि वह संयुक्त तौर पर अफगानिस्तान की स्थिति पर नजर बनाये रखेंगे और सूचनाओं को साझा करते रहेंगे।
दोनो देश संयुक्त तौर पर अफगानिस्तान सरकार को प्रशासनिक मदद देने की योजना पहले से ही चला रहा है। वुहान में पीएम नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच हुई अनौपचारिक मुलाकात में भी अफगानिस्तान का मुद्दा उठा था।
बातचीत से ठीक दो दिन पहले ही अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिए नियुक्त विशेष प्रतिनिधि जाल्मी खलीलजाद भारत के दौरे पर थे। उनकी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मुलाकात हुई जिसमें अफगानिस्तान के हालात और भारत की भावी भूमिका को लेकर चर्चा हुई है। माना जा रहा है कि खलीलजाद के सामने भी भारत ने तालिबान को लेकर अपनी चिंताओं को बेबाकपूर्ण तरीके से रखा है।
सूत्रों के मुताबिक भारत और चीन अफगानिस्तान में तालिबान के आने के बाद बदले हालात और खास तौर पर आतंकवादी गतिविधियों पर पड़ने वाले आसार से खासे चिंतित है। भारत पूर्व में देख चुका है कि अफगानिस्तान की तालिबान सरकार ने कश्मीर में आतंकियों की फौज तैयार करने में पाकिस्तान की पूरी मदद की थी।
दूसरी तरफ चीन अपने उघुर प्रांत में इस्लामिक आतंकवाद के पनपने की आशंका से चिंतित है। चीन इस बारे में अपने मित्र राष्ट्र पाकिस्तान पर भी भरोसा नहीं करता है। चीन के उघुर प्रांत के कुछ आतंकियों को पूर्व में अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर आतंकी प्रशिक्षण लेते हुए पकड़ा गया है। उसके बाद से ही चीन ने ही अपने इस मुस्लिम बहुत प्रांत में कई तरह के कठोर कदम उठाये हैं।

