बेंगलुरु। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर श्री श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन श्रावक संघ ट्रस्ट एवं चातुर्मास समिति, हलसुरु की ओर से चातुर्मास स्थल पर ध्वजारोहण किया गया। कार्यक्रम में संस्था के पदाधिकारियों सहित बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने भाग लिया। ध्वजारोहण के बाद सामूहिक राष्ट्रगान हुआ।
इसके पश्चात आयोजित प्रवचन में पूज्य गुरुदेव डॉ. श्री पदमचन्द्रजी म.सा. ने मानव भव की दुर्लभता, कर्म सिद्धांत, अहिंसा, संस्कार, वैराग्य और संयम की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जीव अनादिकाल से 84 लाख योनियों में परिभ्रमण करता आया है। नरक और निगोद की वेदनाओं से लेकर विभिन्न योनियों में भटकने के बाद बड़ी दुर्लभता से मनुष्य भव प्राप्त होता है। देवगति के जीव भी मनुष्य जीवन की आकांक्षा रखते हैं, क्योंकि इसी भव में तप, संयम और पुरुषार्थ द्वारा कर्मों की निर्जरा का विशेष अवसर मिलता है। गुरुदेव ने कहा कि मनुष्य भव के साथ जिनवाणी, गुरु और धर्म का सान्निध्य मिलना अत्यंत दुर्लभ पुण्योदय है। इस अवसर को भौतिक सुखों में व्यर्थ गंवाने के बजाय अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के पालन में लगाना चाहिए।
अपने कर्मों को समझें, दूसरों को दोष न दें उन्होंने कर्म सिद्धांत समझाते हुए कहा कि जीवन में मिलने वाले सुख-दुःख के लिए दूसरों को दोष देना अज्ञानता है। हमने पूर्व में जैसे कर्म बांधे हैं, उनका फल हमें ही भोगना पड़ता है। अशुभ कर्मों के उदय में यश और सम्मान नहीं मिलता, जबकि शुभ भावों से कर्मों की निर्जरा का मार्ग प्रशस्त होता है। इसलिए बाहरी उपायों के बजाय भावों की विशुद्धि, पंच परमेष्ठी की भक्ति, गुरु वंदना और आत्मनिरीक्षण पर ध्यान देना चाहिए।
अहिंसा और संस्कार जीवन की शक्ति राजा शांतनु और राजकुमारी गंगा के प्रसंग से अहिंसा का महत्व बताते हुए गुरुदेव ने कहा कि मूक और निरपराध जीवों की हिंसा पराक्रम नहीं है। वास्तविक पराक्रम अपने भीतर के क्रोध, मान, माया और लोभ पर विजय प्राप्त करना है। बच्चों को बचपन से धार्मिक पाठशालाओं और ज्ञान शिविरों से जोड़ने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि बाल्यकाल में दिए गए धर्म और अहिंसा के संस्कार जीवनभर आत्मा की रक्षा करते हैं। शिक्षा के साथ संस्कार और चरित्र निर्माण भी जरूरी है।
गुरुदेव ने कहा कि संसार के रिश्ते और सुख स्थायी नहीं हैं। स्वार्थ और अपेक्षाओं के कारण बने संबंध परिस्थितियां बदलने पर बदल जाते हैं। संसार की इस निस्सारता का बोध होने पर ही वैराग्य जागता है। प्रतिकूल परिस्थितियों में दूसरों को दोष देने के बजाय अपने कर्मों को समझकर समता और सकारात्मकता बनाए रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि तप और संयम ही कर्मों की निर्जरा तथा आत्मकल्याण का मार्ग है। संयम के मार्ग में अंतराय कर्म बाधाएं उत्पन्न कर सकते हैं, लेकिन साधक को धैर्य और दृढ़ता नहीं छोड़नी चाहिए। आचार्य भगवंत श्री पार्श्वचंद्रजी म.सा. की कठोर तपस्या का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर मानव भव को सफल बनाना चाहिए। मोह से वैराग्य, कर्मों से निर्जरा और संयम से मोक्ष की ओर बढ़ना ही मानव जीवन की वास्तविक सार्थकता है। प्रवचन में सती गंगा के प्रेरणादायी चरित्र का वर्णन करते हुए डॉ. श्री पदमचंद्र जी म.सा. ने बताया कि बाल्यकाल में मिले संस्कार जीवन के कठिन समय में व्यक्ति को सही दिशा प्रदान करते हैं। गंगा ने अपने जीवन में अहिंसा, करुणा और शाकाहार के प्रति दृढ़ता दिखाई तथा राजा शांतनु को भी शिकार और हिंसा छोड़ने के लिए प्रेरित किया। वास्तविक शांति बाहरी परिस्थितियों को बदलने से नहीं, बल्कि अपने भावों को बदलने से प्राप्त होती है। सकारात्मक चिंतन, संयम और आत्मजागृति से मन को संतुलित रखा जा सकता है। रविवार को डॉ.श्री पदमचन्द्रजी म.सा. द्वारा सती गंगा पर विशेष प्रवचन दिया जाएगा। मध्यान्द में श्री जयमल संस्कार शिविर का आयोजन होगा। अध्यक्ष किशनलाल कोठारी ने स्वागत किया, मंत्री चन्द्रप्रकाश मुथा ने संचालन किया और कार्याध्यक्ष सुनील गादिया ने जानकारी दी।
स्वतंत्रता दिवस पर ध्वजारोहण के बाद हुआ प्रेरणादायी प्रवचन
Highlights
- मानव भव दुर्लभ, संयम से ही आत्मकल्याण संभव : डॉ. श्री पदमचन्द्रजी म.सा.

