नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट/स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) की वैधता को बरकरार रखते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि संबंधित प्रक्रिया कानून और संविधान के दायरे में है तथा इसे मनमाना नहीं कहा जा सकता। हालांकि, अदालत के इस फैसले के बाद राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और कई कानूनी विशेषज्ञों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी भी प्रशासनिक या जांच प्रक्रिया की वैधता का आकलन उसके उद्देश्य, प्रक्रिया और कानूनी आधार के अनुसार किया जाता है। अदालत ने माना कि एसआईआर लागू करने वाली एजेंसियों ने निर्धारित नियमों का पालन किया है और प्रथम दृष्टया इसमें असंवैधानिकता नजर नहीं आती।
फैसले के बाद विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि एसआईआर का इस्तेमाल चुनिंदा लोगों को निशाना बनाने या प्रशासनिक दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है। कई नेताओं ने कहा कि अदालत ने वैधता तो बरकरार रखी है, लेकिन इसके संभावित दुरुपयोग पर पर्याप्त टिप्पणी नहीं की। कुछ सामाजिक संगठनों ने भी पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर चिंता जताई है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला आने वाले समय में कई मामलों के लिए मिसाल बन सकता है। संवैधानिक मामलों के जानकारों के मुताबिक अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि जब तक किसी प्रक्रिया में सीधे तौर पर मौलिक अधिकारों का उल्लंघन साबित नहीं होता, तब तक केवल आशंकाओं के आधार पर उसे रद्द नहीं किया जा सकता। वहीं, सरकार ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह न्यायपालिका का कानून और प्रशासनिक प्रक्रिया पर भरोसा दर्शाता है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि एसआईआर का उद्देश्य व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाना है, न कि किसी व्यक्ति विशेष को परेशान करना।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने उन याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाया, जिनमें निर्वाचन आयोग द्वारा पिछले वर्ष जून में बिहार में एसआईआर कराने संबंधी जारी अधिसूचना को चुनौती दी गई थी। न्यायमूर्ति सूर्यकांत द्वारा सुनाए गये फैसले में कहा गया कि जब कानून स्वयं चुनाव आयोग को किसी भी समय विशेष पुनरीक्षण कराने का अधिकार देता है, तो केवल इस आधार पर इस प्रक्रिया को अवैध नहीं ठहराया जा सकता कि यह नियमित पुनरीक्षण की सामान्य प्रक्रिया के प्रत्येक पहलू का पूरी तरह पालन नहीं करती।
उच्चतम न्यायालय ने कहा, “हमारी सुविचारित राय में यह विवादित एसआईआर ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम’ और उसके नियमों की जगह नहीं लेता है, बल्कि, यह धारा 21(3) द्वारा निर्धारित सटीक कानूनी सीमाओं के भीतर अनुच्छेद 324 के तहत दिए गए संवैधानिक आदेश में नयी जान डालता है। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि आयोग ने अपनी कानूनी शक्तियों से बढ़कर कोई कार्य किया है।” फैसले के बाद देशभर में इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है। एक पक्ष इसे कानून व्यवस्था और प्रशासनिक सुधार की दिशा में अहम कदम बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष नागरिक अधिकारों और संस्थागत जवाबदेही के दृष्टिकोण से इसे लेकर चिंतित नजर आ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर की वैधता रखी बरकरार, फैसले पर उठे सवाल

