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Reading: सामुदायिक व व्यक्तिगत जीवन में भी मर्यादा-व्यवस्था आवश्यक : महातपस्वी महाश्रमण
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सामुदायिक व व्यक्तिगत जीवन में भी मर्यादा-व्यवस्था आवश्यक : महातपस्वी महाश्रमण

Last updated: January 21, 2026 9:46 pm
Surabhi Saloni
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5 Min Read
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Highlights
  • छोटी खाटू प्रवास का दूसरा दिवस 
  • शासनश्री साध्वी कानकुमारीजी व शासनश्री साध्वी कनकश्रीजी की स्मृति सभा का आयोजन 
  • छोटीखाटूवासियों ने आज भी अपने आराध्य की अभिवंदना दी भावनाओं को प्रस्तुति 
21.01.2026, बुधवार, छोटी खाटू, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान)। छोटी खाटू प्रवास का दूसरा दिवस। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के विशाल संघ के साथ उपस्थिति ने पूरे छोटी खाटू के वातावरण को मानों अध्यात्ममय बना दिया है। बुधवार को मर्यादा समवसरण समवसरण में उपस्थित विशाल जनमेदिनी को महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ का मर्यादा महोत्सव निकट आ रहा है। माघ माह, शुक्ल पक्ष में मर्यादा महोत्सव आयोजित होता है। मर्यादा-व्यवस्था का सामुदायिक जीवन में कुछ अतिरिक्त महत्त्व हो सकता है। यों तो मर्यादा व्यवस्था का व्यक्तिगत जीवन में भी आवश्यक है। कुछ-कुछ मर्यादाएं साधना में सहायक मानी जा सकती हैं। राग-द्वेष नहीं करना तो साधना का मूल तत्त्व है। अगर मोक्ष को साधना है तो राग-द्वेष नहीं करने की साधना मौलिक साधन है। मोक्ष अपने आप में राग-द्वेष मुक्त अवस्था की स्थिति होती है। इसलिए साधक की साधना भी राग-द्वेष मुक्ति की होनी चाहिए। राग-द्वेष से मुक्ति की बात ही चारित्र की, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन की भी हो सकती है और इससे जुड़ी हुई बात ही तप की भी हो सकती है। राग-द्वेष की साधना कहें या मर्यादा कह दें, यह मूल चीज है।
कुछ सहायक मार्यादाओं को अपनी सीमा में महत्त्व भी होता है। जैसे स्कूल में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को एक विशेष परिधान भी होता है। हालांकि एक विशेष परिधान में होना शिक्षा का मूल तत्त्व नहीं होता, किन्तु स्कूल की मर्यादा-व्यवस्था है तो उसे नहीं पहनने वाला मर्यादा की अवहेलना करने वाला होता है। स्कूल की मर्यादा को पालना विद्यार्थियों को पालना आवश्यक होता है। उसी प्रकार मूल मर्यादा और सहायक मर्यादाओं का पालन भी आवश्यक है। सहायक मर्यादाओं का अपनी सीमा में महत्त्व है। इसी संगठन की भी अपनी मर्यादाएं होती हैं, जो सहायक रूप में होती हैं। जिसकी जो भी मर्यादाएं हैं, उसके अनुरूप आदमी को रहने का प्रयास करना चाहिए।
आदमी को अपनी मर्यादाओं के प्रति जागरूक रहना चाहिए। जो संविधान, नियम और कानून होते हैं, वे भी मर्यादाएं होती हैं। संविधान भी मर्यादा ही है। मर्यादा के अंदर रहने से सुरक्षा और मर्यादाओं का अतिक्रमण करने से कहीं-कहीं कठिनाई भी हो सकती है। समय पर ट्रेन का गति करना उसकी मर्यादा है। इस प्रकार मर्यादा हर जगह और हर किसी के लिए आवश्यक है। मर्यादाओं का लंघन करने से खतरा उठाना पड़ सकता है।
हमारे यहां मर्यादा महोत्सव मनाया जा रहा है, इस व्यवस्था का शुभारम्भ तेरापंथ धर्मसंघ के चतुर्थ आचार्य श्रीमज्जयाचार्य ने किया था। 161 वर्ष बीत गए हैं। उनके समय शुरु हुआ क्रम आज भी चलता आ रहा है। वे मर्यादा महोत्सव के संस्थापक थे। मर्यादा महोत्सव का समय भी बहुत अनुकूल रखा गया है। एक वार्षिक महोत्सव सा हो जाता है। इसलिए आदमी को अपनी मर्यादा में रह सकता है और उससे वह बुरे कर्मों से बच सकता है, सत्कर्मों में प्रवृत्त हो सकता है। इसलिए मर्यादाओं के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में शासनश्री साध्वी कानकुमारीजी (चुरू) और शासनश्री साध्वी कनकश्रीजी (राजगढ़) की स्मृति सभा का आयोजन हुआ, जिसमें आचार्यश्री ने दिवंगत दोनों साध्वियों के संक्षिप्त जीवन परिचय को प्रदान करते हुए उनकी आत्मा के प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना की। आचार्यश्री के साथ उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ ने चार लोगस्स का ध्यान किया।
साध्वीद्वय की आत्मा के प्रति मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी, साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी व साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने आध्यात्मिक मंगलकामना की। तदुपरान्त साध्वी महकप्रभाजी, साध्वी सिद्धांतप्रभाजी, समणी ज्योतिप्रज्ञाजी, समणी कुसुमप्रज्ञाजी, साध्वी श्रेष्ठप्रभाजी, मुनि पारसकुमारजी, साध्वी सन्मतिप्रभाजी ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी।
सुनाम-पंजाब की ओर साध्वीश्री कनकश्रीजी के संदर्भ में प्रस्तुति दी गई। डॉ. ऊषा जैन, नोखा तेरापंथी सभा के अध्यक्ष श्री शुभकरण चोरड़िया ने अपनी अभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मण्डल-नोखा ने गीत का संगान किया। श्री लालचन्द छाजेड़ ने अपनी अभिव्यक्ति दी।
आचार्यश्री के स्वागत में साध्वी जगतयशाजी व मुनि मार्दवकुमारजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। ज्ञानशाला के प्रशिक्षक, प्रशिक्षकाएं और संयोजक आदि ने सामूहिक रूप में गीत को प्रस्तुति दी। धारीवाल परिवार के बच्चों ने अपनी प्रस्तुति दी। श्री विजयसिंहजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी।

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