मुंबई: 30 साल तक भाजपा की सहयोगी रही शिवसेना अब अलग होकर लगातार हमलावर है। पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ की संपादकीय में वह मोदी सरकार पर निशाना साध रही है। मंगलवार को ‘दवाइयां महंगी मरना हुआ सस्ता!’ नाम से लिखी संपादकीय में केंद्र की सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए गए हैं। दवाइयों के दाम में 50 प्रतिशत तक की गई वृद्धि के फैसले पर कहा कि इस कदम से आम इंसान का जीना महंगा और मरना सस्ता हो गया है। कुछ दिनों पहले दवाइयों की कीमत 50 फीसद तक बढ़ाने का निर्णय लिया गया था। इसमें कई जीवनरक्षक दवाएं भी शामिल हैं।
‘सामना’ में लिखा-, ‘देश में पहले से ही अनाज, सब्जियों, दूध, फल आदि के दाम बढ़े हुए हैं। ऐसे में अब 509 दवाइयों की कीमतें बढ़ा दी गईं। इनमें छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों के काम आने वाली दवाइयां भी शामिल हैं. बीसीजी टीका, क्लोराक्वाइन, डैटसोन, विटामिन सी, मेट्रोनिशजोल जैसी लगभग 21 दवाइयों की कीमतें सीधे 50 फीसद बढ़ा दी गई हैं।’
सामना की संपादकीय में यह भी लिखा ..
- केंद्र की सरकार देश की जनता का जीना आसान करने के लिए सत्ता में आई है या असहनीय बनाने के लिए? अनाज समेत जीवनावश्यक वस्तुओं की कीमतें आसमान छू ही रही हैं। अब केंद्र सरकार ने जीवनावश्यक दवाइयों की महंगाई का झटका दिया है। एक तरफ आर्थिक मंदी ने रोजगार पर वार किया है। सरकारी दावों के बावजूद मंदी के कारण हर क्षेत्र में बाजार सुस्त हो चुके हैं।
- जहां रोज पेट भरने के लिए हाथ-पैर मारे जाते हों, वहां दूसरी चीजों की खरीद-फरोख्त के लिए कर ही क्या सकते हैं? जनता की जेब में पैसा होगा तभी खरीद-फरोख्त की जा सकती है। यहां तो पैसे का ही भाटा शुरू है और महंगाई का ज्वार थमने का नाम नहीं ले रहा। इसलिए रोज जीने के लिए आम आदमी अपना दिन काट रहा है। अब इस पर दवाइयों की महंगाई का बोझ भी उसे सहन करना होगा। इंसान एक बार आधा पेट रहकर गुजारा कर लेगा लेकिन आवश्यक दवाइयों को कैसे टाल पाएगा? ये दवाइयां कितनी भी महंगी हों तब भी उसे खरीदना ही पड़ेगा।
- जहां रोजमर्रा के खर्च का तालमेल बैठाना ही मुश्किल हो रहा हो, वहां दवाइयों की बढ़ी कीमतों से तालमेल कैसे बिठाया जा सकेगा, ये असली सवाल है। डायबिटीज, हेपिटाइटिस बी और सी, कैंसर की दवाइयां भी महंगी हो गई हैं। बीसीजी का टीका छोटे बच्चों को लगाना आवश्यक होता है। जो 21 दवाइयां महंगी हुई हैं वे एलर्जी, सर्दी, बुखार और मलेरिया आदि बीमारियों के दौरान ली जाने वाली हैं। इंसान की बदलती जीवनशैली, प्रदूषण और प्राकृतिक बदलाव के कारण ये सभी बीमारियां बार-बार होती रहती हैं।
- दवाइयों के लिए आवश्यक घटक द्रव्य और उत्पादन मूल्य आदि के बढ़ने के कारण दवाइयों की कीमतें बढ़ाई जाएं, ऐसी दवा निर्माताओं की मांग थी। इसलिए ये अपरिहार्य कीमत बढ़ोत्तरी की गई है, ऐसा खुलासा राष्ट्रीय दवा मूल्य निर्धारण प्राधिकरण ने किया है। इसमें तथ्य हो सकता है लेकिन आम आदमी इस महंगाई को कैसे सहन करेगा? इस सवाल का उत्तर न तो सरकार देगी और न ही दवा निर्माण करने वाली कंपनियां देंगी।
- सरकार एक तरफ देश की 50 करोड़ गरीब जनता के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना लागू करने का श्रेय लेती है और दूसरी तरफ जीवनावश्यक दवाइयों को महंगा करके गरीबों का जीना मुश्किल कर देती है। अनाज महंगा हो गया तो जीना टाल दो और जीवनावश्यक दवाइयां महंगी हो गई हैं इसलिए मौत को पास बुलाओ, सरकार ऐसा कहना चाहती है क्या? इस देश में आम इंसान का जीना महंगा और मरना सस्ता हो गया है। दवाइयों की महंगाई ने इसे और सस्ता कर दिया है।

