लाडनूं । जैन विश्व भारती परिसर में योगक्षेम वर्ष का मंगल प्रवास कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में रविवार को तेरापंथ धर्मसंघ के दसवें अनुशास्ता, प्रेक्षा प्रणेता आचार्यश्री महाप्रज्ञजी का 107वां जन्मदिवस आध्यात्मिक रूप में समायोजित हुआ।
शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने रविवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन प्रवचन कार्यक्रम में आज के निर्धारित विषय ‘प्रज्ञा से समीक्षा करें (आचार्यश्री महाप्रज्ञ: 107वां जन्मदिवस) पर पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि धर्म तत्त्व का विनिश्चय, अथवा समीक्षा प्रज्ञा से होती है। आदमी के जीवन में शारीरिक स्वास्थ्य का भी महत्त्व है। आदमी का शरीर पुष्ट, शक्तिशाली होता है तो आदमी परिश्रम कर सकता है, यात्रा कर सकता है और परिश्रम भी कर सकता है। व्याख्यान भी देना होता है तो शारीरिक अनुकूलता अपेक्षित है। शरीर स्वस्थ न हो तो व्याख्यान देना भी कठिन लगता है। शरीर अस्वस्थ हो जाए तो डॉक्टर के पास जाना होता है, दिखाना होता है, संदर्भित चीज का उचित ईलाज भी कराना होता है। शरीर को स्वस्थ बनाए रखने का उपक्रम भी करना होता है।
आचार्यश्री ने कहा कि आदमी ऐसा प्रयास करे कि उसे डॉक्टर के पास न जाना पड़े, दवाइयों की आवश्यकता न पड़े, इस हिसाब से उसे अपना शारीरिक स्वास्थ्य रखने का प्रयास करना चाहिए। एक जीवन का एक आयाम हो सकता है। आदमी के जीवन में मानसिक स्वास्थ्य का भी बहुत बड़ा महत्त्व है। मन में शांति, समाधि रहे। मन में ज्यादा भय और चिंता न हो। जिसके मन में भय हो, चिंता हो, गुस्सा हो उसके जीवन में भी उथल-पुथल की स्थिति रह सकती है। आगे भावात्मक स्वास्थ्य की बात भी आती है। मन के गहराई में भी भीतर के भाव शुद्ध रहें। आदमी जैसा कर्म करे, अथवा जैसा उसका भाग्य होता है, उसका शरीर और मन भी असर पड़ता है। इस प्रकार शारीरिक, मानसिक और भावात्मक स्वास्थ्य अच्छा रहे, इसका प्रयास होना चाहिए। जिसके मोहनीय कर्म का क्षयोपशम हो जाता है, उसका भावात्मक स्वास्थ्य भी अच्छा रह सकता है। आज आषाढ़ कृष्णा त्रयोदशी है।
हमारे धर्मसंघ के परम पूजनीय, परम वंदनीय दशमाधिशास्ता पूज्य आचार्यश्री महाप्रज्ञजी का 107वां जन्मदिवस है। जिसे हम प्रज्ञा दिवस के रूप में भी देखते हैं। आचार्यश्री ने बालावस्था में ही मुनि दीक्षा प्राप्त कर ली थी। उन्होंने ज्ञान के लिए भी कितना प्रयास किया होगा। ज्ञान को दो प्रकार से समझा जा सकता है। एक होता है कुएं का पानी और एक है कुण्ड का पानी। कुण्ड के पानी में से वही पानी प्राप्त किया जा सकता है, जितना उसमें डाला गया हो और कुएं में भीतर से आता है, उसमें से निरंतर आता रहता है। इसी प्रकार जितना रटकर, पढ़कर जो याद किया तो वह ज्ञान कुण्ड के पानी के समान होता है। भीतर से प्रस्फुरित होने वाला ज्ञान कुएं के पानी के समान होता है। अवधि ज्ञान, मनःपर्यव ज्ञान आदि कुएं के ज्ञान के समान हैं। मतिश्रुत ज्ञान में भी भीतर से प्राप्त होने वाला ज्ञान होता है।
आचार्यश्री महाप्रज्ञजी ने कुण्ड के पानी के समान वाले भी ज्ञान को भी प्राप्त किया था। उन्होंने कितना रटा होगा, कितना श्रम होगा। आचार्यश्री महाप्रज्ञजी जब मुनि अवस्था में थे तो उन्होंने कितने-कितने ज्ञान का अर्जन किया था। उन्होंने संस्कृत का कितना ज्ञान किया था। ‘महाप्रज्ञ वाङ्मय’ को देखा जाए, ‘जैन दर्शन: मनन और मीमांसा’ को पढ़ा और देखा जा सकता है। उनके प्रवचन को भी सुनने से उनके वैदुष्य का ज्ञान हो सकता है। प्रेक्षाध्यान के विकास में पूज्य आचार्यश्री महाप्रज्ञजी का कितना योगदान है। महाप्रज्ञ श्रुताराधना पाठ्यक्रम भी कई वर्षों से संचालित हो रहा है। इसके साथ-साथ और भी ज्ञान प्राप्ति के मार्ग है, जिनके माध्यम से साधु-साध्वियों को ज्ञानार्जन करने का प्रयास करना चाहिए। हम सभी उनके जीवन से प्रेरणा लेकर ज्ञान, दर्शन चारित्र की दिशा में आगे बढ़ते रहें, ऐसा प्रयास होना चाहिए। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के जीवन प्रसंगों का वर्णन कर अपना श्रद्धार्पण किया। जैन विश्व भारती के अध्यक्ष श्री अमरचंद लुंकड़ ने अपनी अभिव्यक्ति दी। मुनि राजकुमारजी ने आचार्यश्री से आठ की तपस्या का प्रत्याख्यान किया। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में छठे प्रेक्षा इण्टरनेशनल कन्वेंशन में प्रेक्षा इण्टरनेशनल के नवनिर्वाचित अध्यक्ष श्री सम्पतमल नाहटा को निवर्तमान अध्यक्ष श्री अरविंद संचेती शपथ दिलाई। श्री नाहटा ने अपनी अभिव्यक्ति देते हुए अपनी टीम के सदस्यों के नामों की घोषणा की। आचार्यश्री ने नई टीम को मंगलपाठ सुनाया।

