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लुंचन के प्रति जागरूक रहे साधु : सिद्ध साधक आचार्यश्री महाश्रमण

Last updated: June 16, 2026 11:54 pm
Surabhi Saloni
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4 Min Read
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Highlights
  • आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को किया उत्तरित

लाडनूं । जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगलवार को प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को नित्य की भांति कुछ समय तक ध्यान का प्रयोग कराया। तदुपरान्त आचार्यश्री ने आज के निर्धारित विषय ‘केशलुंचन: एक चिंतन’ को आगम के माध्यम से विवेचित करते हुए कहा कि शास्त्रों साध्वाचार से संबंधित अनेक बातें बताई गई हैं। उनमें तीन दुष्कर बातें भी बताई गई हैं। इनमें पहली वृत्ति कापोति है। कापोति अर्थात् कबूतर। कबूतर अगर दाना भी चुगता है तो वह सशंकित रहता है, वह दोष भीरूता होती है, उसी तरह साधु भी यह हमेशा ध्यान रखे कि कहीं दोष न लग जाए। गोचरी, भीक्षा आदि में दोष न लगे।
वृक्षों अथवा पौधों पर खिले पुष्पों पर जब भंवरा आता है तो सभी फूल से थोड़ा-थोड़ा रस पीता है, उसी प्रकार साधु भी कई घरों में जाते हैं, थोड़ा-थोड़ा आहार सभी घरों से आहार लाते हैं। इस प्रकार भ्रामरी वृत्ति होनी चाहिए। अपने यहां प्रसिद्ध शब्द है गोचरी। गोचरी जाना है। साधु को भोजन बनाना नहीं, दूसरों से बनवाना नहीं, उसे मांगकर ही खाना होता है। घरों आदि में बने सहज भोजन को प्राप्त कर अपना जीवन-यापन करते हैं। साधु के लिए केशलोच की परंपरा भी जैन शासन में चली आ रही है। केशों को हाथों से उखाड़ा जाता है। यह कठिन कार्य है, किन्तु आज भी केशलोच का कार्य हो रहा है। पुरुष साधु को तो मुंह आदि का भी लोच होता रहता है। इस परंपरा का निष्ठा पूर्वक पालन हो रहा है। लोच करने की भी कला होती है कि केश लोच भी हो जाए और ज्यादा पीड़ा भी न हो। केश लोच भी एक दारुण कार्य है। ज्यादा लम्बा बाल रखने से हिंसा भी हो सकती है। उसमें जूं आदि हो जाती है। केश को अलंकार भी कहा गया है और साधु को किसी प्रकार का अलंकार धारण करना नहीं होता, इसलिए केशलुंचन की विधि होती है। केशों को उतारना ही चाहिए। प्रश्न हो सकता है कि केश लोच हाथ से ही क्यों, अन्य चीजों के माध्यम से भी केशों को उतारा जा सकता है?
लोच यदि किसी साधन से हो और मस्तक में कहीं जूं अथवा कोई जीव हो तो उसकी हिंसा भी हो सकती है। हाथों से केशलोच करने में हिंसा नहीं हो सकती और अहिंसा का भी पालन हो सकता है। दूसरी बात अहिंसा का पुजारी साधु कैंची, उस्तरा आदि के रूप में शस्त्र को हाथ में ही क्यों ले। इसलिए केशलोच को हाथ से लेने की विधा है। एक बात और हो सकती है साधु तपस्या करने वाले होते हैं, सहनशील होते हैं। केशलोच कराने वाला कितना तपस्वी होता है, जो उस कष्ट को सहन करता है। सहिष्णुता और तपस्या की दृष्टि से भी केशलोच बहुत सुन्दर है। संवत्सरी से पहले-पहले लोच तो हो ही जानी चाहिए। संवत्सरी से पहले मुण्डित होना ही होता है। जिनमें साधना की भावना होती है, वे कठिन कार्य भी कर लेते हैं। लोच करने वाले भी सेवा का कार्य करते हैं। कई-कई साधु-साध्वियों केशलोच में भी दक्ष होते हैं। इसके प्रति भी जागरूक बने रहने का प्रयास होना चाहिए। मंगल प्रवचन के उपरान्त मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया तो अनेक चारित्रात्माओं ने अपनी जिज्ञासाएं प्रस्तुत कीं, जिसे आचार्यश्री ने उत्तरित किया।

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