कनाडा से भरतकुमार सोलंकी की रिपोर्ट –
विदेशी शहरों की चमचमाती सड़कें, अनुशासित ट्रैफिक और तकनीक से सुसज्जित व्यवस्था अक्सर लोगों को आकर्षित करती है, लेकिन कनाडा में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने आधुनिकता के बीच संवेदनशीलता और जीवदया के जीवंत दर्शन करा दिए।
एक सड़क पर अचानक वाहनों की लंबी कतार रुक गई। पहले लगा कि शायद ट्रैफिक सिग्नल या कोई तकनीकी बाधा होगी, लेकिन कुछ ही क्षणों बाद दृश्य स्पष्ट हुआ। सड़क पार करते हुए बतखों का एक झुंड छोटे-छोटे कदमों से आगे बढ़ रहा था और सड़क पर खड़ी कारों में बैठे चालक बिना हॉर्न बजाए, बिना अधीरता दिखाए, शांत भाव से उनके सड़क पार करने का इंतजार कर रहे थे।
यह दृश्य केवल पक्षियों के प्रति दया नहीं था, बल्कि यह उस सामाजिक संस्कार और प्रशासनिक सोच का परिचायक था जिसमें मनुष्य के साथ-साथ जीव-जंतुओं के जीवन को भी समान महत्व दिया जाता है।
और आश्चर्य तब और बढ़ गया जब सड़क किनारे इन पक्षियों की सुरक्षा के लिए लगाए गए विशेष साइन बोर्ड दिखाई दिए। यह केवल चेतावनी बोर्ड नहीं थे, बल्कि यह उस मानसिकता का प्रतीक थे जिसमें प्रशासन नागरिकों को यह संदेश देता है कि सड़कें केवल इंसानों के लिए नहीं, बल्कि प्रकृति और जीव-जंतुओं के साथ साझा जिम्मेदारी भी हैं। विदेशों में अक्सर राहगीरों को सड़क पार करते समय वाहन चालकों द्वारा सुरक्षित दूरी बनाकर रुक जाना, साइकिल चालकों के लिए अलग लेन और पैदल यात्रियों को प्राथमिकता देना देखा जाता है, लेकिन पक्षियों के प्रति इतना धैर्य और संवेदनशीलता वास्तव में भावुक कर देने वाला अनुभव था।
भारत में “अहिंसा” और “जीवदया” केवल धार्मिक या सांस्कृतिक शब्द नहीं हैं। हमारे देश की आत्मा में इन मूल्यों का गहरा स्थान है। जैन, बौद्ध और वैदिक परंपराओं से लेकर लोक जीवन तक जीवों के प्रति दया और सह-अस्तित्व का संदेश दिया जाता रहा है। लेकिन आज के शहरी जीवन में कई बार यह संवेदनशीलता व्यवहार में कम दिखाई देती है। कनाडा की इस घटना ने यह सोचने पर मजबूर किया कि जिन सिद्धांतों को हम अपनी संस्कृति की पहचान मानते हैं, उन्हें यदि व्यवहार और व्यवस्था का हिस्सा बना दिया जाए तो समाज कितना मानवीय और संतुलित बन सकता है। यह दृश्य केवल बतखों का सड़क पार करना नहीं था, बल्कि यह सभ्यता के उस स्तर का उदाहरण था जहां विकास और संवेदनशीलता साथ-साथ चलते हैं। जहां ट्रैफिक की गति से अधिक महत्व जीवन को दिया जाता है। जहां नियम केवल दंड के भय से नहीं, बल्कि भीतर की संवेदना से पालन किए जाते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत में भी “जीवदया” को केवल धार्मिक प्रवचनों या पुस्तकों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि सड़क व्यवस्था, नगर नियोजन, ट्रैफिक शिक्षा और सामाजिक व्यवहार में भी उतारा जाए। क्योंकि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति उसकी ऊंची इमारतों से नहीं, बल्कि उसके भीतर मौजूद संवेदनशीलता से मापी जाती है।

