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हम सबके मानस में हैं राम

Last updated: October 8, 2019 4:23 pm
Surabhi Saloni
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7 Min Read
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विश्वनाथ त्रिपाठी।।
राम भारतीय संस्कृति के प्रतीक रहे हैं। महात्मा गांधी के राम तो विश्व संस्कृति के प्रतीक हैं। आराध्य की मूर्ति आराधक से बनती है। महात्मा गांधी भारत के थे और विश्व के भी। उनके आराध्य बनकर राम वैश्विक संस्कृति के प्रतीक हो गए।

राम के जीवन पर आधारित वाल्मीकि  का रामायण हमारा आदिकाव्य है। वेद-पुराण देवताओं की गाथा बखानते हैं, रामायण मनुष्य की, इसीलिए वह काव्य है। वह इसी लोक और अपने ही काल की गाथा कहता है- कोन्वस्मिन् साम्प्रतं लोके। सच पूछिए, तो काव्य का आधार प्रत्येक युग में अपना समय और अपना लोक, अपना देश-काल होता है। काव्य और उसके चरित्रों-पात्रों में प्रतीक होने की क्षमता होती है, इसीलिए वह कालजयी हो जाता है।

राम का जनप्रिय रूप उनके व्यक्तित्व का विशेष गुण रहा है। भगवान के सभी अवतार आराध्य हैं, किंतु राम सर्वाधिक जनप्रिय हैं। वाल्मीकि रामायण में तो उनकी जनप्रियता बार-बार रेखांकित की जाती है-
रामो नाम जनै: श्रुत:।

राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। कृष्ण को लीला पुरुषोत्तम। यह मर्यादा पुरुषोत्तमत्व राम को यूं ही नहीं मिला है। भगवान के शायद किसी अन्य अवतार रूप ने आजीवन इतना संघर्ष नहीं किया। कृष्ण की लीला याद आती है बरबस, और राम का वनवास। राम कथा के महान गायकों ने राम की इस आजीवन संघर्ष-गाथा को अनेकश: रेखांकित किया है। वाल्मीकि के राम कहते हैं- वसुंधरा पर मेरे समान दुखी और कोई नहीं, मेरे हृदय और मन को शोक की परंपरा बेधती रहती है। भवभूति के राम का दुख तो ऐसा है कि पत्थर को भी रुला दे।

राम के व्यक्तित्व की विशेषता यह है कि वह प्रत्येक युग के महानायक हैं। लोकचित्त ने उनके व्यक्तित्व को ऐतिहासिक स्थितियों के अनुकूल गढ़ लिया है। वह प्रत्येक युग की सामाजिक-ऐतिहासिक स्थितियों के ही नहीं, उस युग के व्यक्ति की मानसिकता की द्वंद्वात्मकता और औदात्य का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।
आज भारतीय समाज में राम का जो रूप सामान्य जनता में मान्य है, वह तुलसीदास के राम का है। महात्मा गांधी से जब हिंदी भाषा और साहित्य के बारे में बात की गई, तो उन्होंने कहा-जिस भाषा में तुलसीदास हुए हैं, उसका पुजारी तो मैं अपने आप हूं। तुलसी के राम सर्वशक्तिमान हैं। वह दुखी नहीं, दुख तो उन्हें व्याप ही नहीं सकता, लेकिन उनका संबंध मध्यकालीन भारत की जनता के दुख से है। तुलसी ने उन्हें ‘करुणा निधान’, ‘गरीब नेवाज’ और रामराज का संस्थापक कहा है। उनके राज में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप से जनता मुक्त है-
दैहिक, दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि व्यापा।।

तुलसी की कविता में मध्यकालीन समाज के अनेक-विध भौतिक, दैविक, दैहिक तापों की दारुण कथा है- अकाल, भुखमरी, रोग, स्त्री-पराधीनता, क्रूर शासन, अत्याचार, काम, क्रोध, मोह, लोभ, बेरोजगारी का दारुण चित्रण है, तो दूसरी ओर इन सबसे मुक्त परम सुखद रामराज का स्वप्न विजन है। प्रकृति और मनुष्य, दोनों एक-दूसरे के सहयोगी हैं। बादल किसान की इच्छा से जल की वर्षा करते हैं। समुद्र अपनी मर्यादा में है। वे तट पर रत्न डाल देते हैं, मनुष्य उनका उपभोग, उपयोग करते हैं। यह मर्यादा राम के व्यक्तित्व का परम रूप है। उनके कारण यह मर्यादा व्यवस्था में, प्रकृति में भी आ गई। इसीलिए राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। हमारे युग के महानायक गांधी का स्वप्न यही रामराज है। तुलसी के राम का रामत्व जनता के दुख-सुख के सरोकारों से प्रतिफलित है।

राम का व्यक्तित्व ऐसा है कि वह समाज के निम्नतम स्तर पर पडे़ हुए आदमी के साथ खडे़ हैं। उसके हर प्रकार के दुख की उन्हें चिंता है- राम गरीबनेवाज! भए हौं गरीबनेवाज गरीब नेवाजी।  राम गरीबों को नेवाजकर, उन पर कृपा करके गरीब नेवाजी हुए हैं। तुलसीदास के काव्य का औदात्य इस बात में है कि उन्होंने मध्यकाल में निम्नतम जनता के सारे दुखों को राम के हवाले कर दिया है। राम ही नहीं, अन्य देवताओं को भी जहां उनकी जरूरत है, वहां पहुंचा दिया है। उदाहरण के लिए, अन्नपूर्णा को राज महलों से निकालकर कंगालों के बीच; राम को भूखे, रोगी, काम से पीड़ित जनों के पास। रामवन गमन एक विशाल, सर्वसंग्रही उदात्त बिंब और प्रतीक भी है कि राजकुमार राजमहल छोड़कर जनता के बीच आता है, वन में जाकर साधु-संतों की रक्षा करता है। राम का वन गमन वस्तुत: रामराज्य का आधार है। दोनों में प्रधान सामान्य जन की हित-चिंता है। सर्वजन हित चिंता में ही राम का मर्यादा पुरुषोत्तमत्व झलकता है। राम का असाधारणत्व, आज की भाषा में उनकी क्रांतिकारिता उनकी सहजता में है। यह सहजता ही उनकी शक्ति, शील और सौंदर्य की आधार भूमि है-

सहजहिं चले सकल जग स्वामी।
मत मंजु बर कुंजर गामी।।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते थे कि राम विभाव पुरुष हैं। अभाव इतिहास में विभाव का निर्माण करता है। जिसकी जरूरत होती है, उसकी कमी महसूस होती है, तब वह विचार कल्पना और संवेदना का विषय बनता है। स्वाधीनता आंदोलन में हम एक ऐसी विदेशी शक्ति से जूझ रहे थे, जो हमसे अधिक शक्तिशालिनी थी। इसीलिए इस युग के रामकथा के महान गायक निराला के राम शक्ति की पूजा करते हैं। निराला के राम का दुख- धिक् जीवन जो पाता ही आया विरोध, उन्हीं का दुख नहीं है। वह इतिहास का दुख है, विभाव पुरुष राम का दुख है। राम का यही व्यक्तित्व हमारे संघर्ष और स्वप्न का सनातन प्रतीक है।

राम हमारे मानस में हैं। हम कोई भी काम शुरू करते हैं, तो राम का नाम लेकर करते हैं। राम का नाम लेकर शत्रु से युद्ध तो कर सकते हैं, लेकिन किसी असहाय को पीड़ित नहीं कर सकते।

Thanks:https://www.livehindustan.com

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