लाडनूं । जन-जन के मानस को आध्यात्मिक शांति प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की अमृतवाणी निरंतर तेरापंथ की राजधानी लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती परिसर से प्रवाहित हो रही है। इस अमृतवाणी का रसपान करने के लिए प्रतिदिन सैंकड़ों-सैंकड़ों की संख्या में श्रद्धालु उमड़ रहे हैं। रविवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आज के निर्धारित विषय ‘बहुश्रुत की महिमा’ को व्याख्यायित करते हुए कहा कि बहुश्रुत होना साधु का एक वैशिष्ट्य होता है। ज्ञान की आराधना भी एक प्रकार की साधना होती है। जो ज्ञानी हैं, उन्होंने ज्ञान प्राप्ति में कितना समय और श्रम लगाया होगा। इसके अलावा भी कितना समय लेखन, पठन-पाठन आदि-आदि में नियोजित किया होगा।
एक मत है कि उत्कृष्ट बहुश्रुत तो पूर्वों का ज्ञान रखने वाला होता है। श्रुत का संबंध उपाध्याय के साथ भी है। वर्तमान में हमारे धर्मसंघ में उपाध्याय के पद पर कोई साधु-साध्वी नियुक्त नहीं हैं। वैसे तेरापंथ धर्मसंघ में उपाध्याय का अलग से कोई पद नहीं होता। तेरापंथ धर्मसंघ में आचार्य, उपाध्याय और साधु- तीनों ही पद एक आचार्य में ही समाहित रहते हैं।
गणी अर्थात् आचार्य के पास श्रुत की भी एक संपदा होती है। आचार्य में आचार संपदा हो, छत्तीस गुणों के धारक होने के साथ-साथ श्रुत की संपदा भी होनी चाहिए। हालांकि सापेक्ष बात हो सकती है कि सबमें एक समान ज्ञान न भी हो।
श्रुत की आराधना के स्वाध्याय करने का प्रयास करना चाहिए। श्रुत के विकास के लिए शील और अपनी बुद्धि का होना बहुत आवश्यक होता है। जिसके बाद अच्छी ग्रहणीय बुद्धि होती है तो वह थोड़ा भी आगम आदि ग्रन्थों को पढ़ता है तो वह उससे ज्यादा ग्रहण कर सकता है। इसलिए ज्ञान के विकास में स्वयं की बुद्धि का होना भी बहुत आवश्यक है। बहुश्रुत साधुओं की राय भी ले लेनी चाहिए। किसी विषय पर यदि आचार्य को लगे तो बहुश्रुत सदस्यों का सलाह भी ले सकते हैं। ज्ञान के साथ-साथ साधना का भी विकास करने का प्रयास करना चाहिए। बहुश्रुत का साधना पुष्ट रहता है तो वह प्रतिष्ठित रहता है, उसकी कीर्ति भी फैल सकती है। बहुश्रुत बनने के लिए कितना नियोजन करना होता है। यह सारस्वत साधना होती है। ज्ञान की साधना और आराधना करने वाले को बाह्य आकर्षण से बचने का प्रयास करना चाहिए।
छोटे संत और साध्वियां हैं। उन्हें भी बाह्य आकर्षणों से बचते हुए ज्ञान की आराधना में अधिक समय लगाने का प्रयास करना चाहिए। महाप्रज्ञ श्रुताराधना पाठ्यक्रम श्रुत की आराधना के लिए बहुत अच्छा माध्यम है। इससे अनेक चारित्रात्मा भी जुड़े हुए भी हैं। इसके डायरेक्टर साध्वीप्रमुखाजी हैं। इसके अलावा भी ज्ञान प्राप्ति के अनेक माध्यम हो सकते हैं। श्रुत और साधु की महिमा एक-दूसरे से बढ़ती है। आगम वाचन और उसके माध्यम से आगमाधारित व्याख्यान, प्रवचन आदि भी करने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार बहुश्रुत बनने का यथासंभव प्रयास करना चाहिए। मंगल प्रवचन के उपरान्त कुछ समय पहले बहिर्विहार से गुरुकुलवास में पहुंची साध्वी समुदाय ने अग्रणी संत समुदाय से खमतखामणा किए तो अग्रणी संत समुदाय की ओर से मुनि धर्मरुचिजी ने खमतखामणा किए। तदुपरान्त सहवर्ती संतों ने भी साध्वीवृंद से खमतखामणा किए। तदुपरान्त आचार्यश्री ने साध्वी पद्मप्रभाजी व मुनि नमनकुमारजी से आज हुए प्रवचन के संदर्भ में प्रश्न भी किए। तत्पश्चात आचार्यश्री की अभिवंदना में साध्वी मलयप्रभाजी, साध्वी राजश्रीजी व साध्वी ऋजुप्रज्ञाजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। मुनि ऋषिकुमारजी ने गीत का संगान किया।

