मुंबई। गोडवाड़ क्षेत्र के प्रमुख जैन तीर्थों में शामिल सुमेर के प्राचीन शांतिनाथ भगवान मंदिर से पूरे गोडवाड़ जैन समाज की गहरी आस्था जुड़ी हुई है। लगभग 1400 वर्ष प्राचीन इस तीर्थ में पद्मासन मुद्रा में विराजित मूलनायक श्री शांतिनाथ भगवान के साथ बाईं ओर श्री अरनाथ भगवान तथा दाईं ओर श्री कुंथुनाथ भगवान की त्रिगदा में दुर्लभ प्रतिमाएं स्थापित हैं, जो इस तीर्थ को विशिष्ट बनाती हैं।
बीते चार-पांच वर्षों से देसूरी–सुमेर सड़क मार्ग की जर्जर स्थिति के कारण श्रद्धालुओं, वृद्ध भक्तों और यात्रियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा था। तीर्थ की एकांत स्थिति और खराब सड़क के कारण दर्शनार्थियों की संख्या भी प्रभावित हुई। अब इस मार्ग के निर्माण हेतु प्रक्रिया टेंडर स्तर तक पहुंचने से देश–विदेश में बसे प्रवासी गोडवाड़ वासियों, विशेषकर मुंबई के जैन समाज में हर्ष की लहर है।
सामाजिक कार्यकर्ता भरतकुमार सोलंकी के निरंतर दस्तावेज़ी प्रयास, प्रशासनिक फॉलो-अप और जयपुर स्तर तक की पहल से यह प्रकरण आगे बढ़ सका। गोडवाड़ जैन समाज का मानना है कि सड़क निर्माण पूर्ण होने से न केवल तीर्थ तक पहुंच सुगम होगी, बल्कि धार्मिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा और सुमेर जैसे प्राचीन तीर्थ का पुनः गौरव लौटेगा। समाज के वरिष्ठजनों ने प्रशासन से निविदा प्रक्रिया पूर्ण होते ही कार्य शीघ्र प्रारंभ करने की अपील की है। ज्ञात रहे कि गोडवाड़ की पंचतीर्थी में प्रमुख नाडोल, नारलाई, देसूरी और सुमेर के साथ कोट–सोलंकियान शामिल हैं। प्राचीन काल में ये पाँचों गांव बड़े कस्बों और नगरीय स्वरूप में विकसित थे।
सुमेर भी कभी एक विशाल खेड़ा गांव और समृद्ध नगरी के रूप में जाना जाता था, जो नदी किनारे बसा होने के कारण व्यापार और बसाहट का महत्वपूर्ण केंद्र रहा। समय–काल के थपेड़ों और आक्रमणों ने भले ही इस प्राचीन नगरी को तहस–नहस कर दिया हो, लेकिन आज भी नदी तट पर फैली प्राचीन दीवारों और भग्नावशेषों के अवशेष सुमेर के एक समृद्ध कस्बा होने की गवाही देते हैं। यही ऐतिहासिक विरासत और धार्मिक आस्था सुमेर तीर्थ को गोडवाड़ जैन समाज के लिए केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति और गौरव का प्रतीक बनाती है।
गोडवाड़ के प्रमुख तीर्थ सुमेर तक अब सुगम होगी यात्रा, जैन समाज में हर्ष की लहर

