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Reading: एकता के सूत्र हैं- एक आचार, एक विचार, एक आचार्य, एक विधान व एक गुरु : महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण
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एकता के सूत्र हैं- एक आचार, एक विचार, एक आचार्य, एक विधान व एक गुरु : महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण

Last updated: January 25, 2026 8:50 pm
Surabhi Saloni
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9 Min Read
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Highlights
  • 162वें मर्यादा महोत्सव के शिखर दिवस पर तेरापंथ धर्मसंघ के शिखरपुरुष का मंगल पाथेय
  • पंजाब पर बरसी गुरुकृपा, वर्ष 2029 का चतुर्मास लुधियाना में करने की हुई घोषणा
  • पंजाब के अनेकानेक क्षेत्रों की यात्रा के साथ शिमला व जम्मू जाने की आचार्यश्री ने की घोषणा
  • वर्ष 2027 की अक्षय तृतीया, जन्मोत्सव, पट्टोत्सव श्रीगंगानगर अंचल को हुआ प्राप्त
  • साधु-साध्वियों के विहार, चतुर्मास भी आचार्यश्री ने किए घोषित
  • जैन विश्व भारती में दीक्षा देने हेतु मुमुक्षुओं के नाम की भी हुई घोषणा
  • तेरापंथ धर्मसंघ की नवमी साध्वीप्रमुखाजी ने भी किया जनता को उद्बोधित
  • साधु, साध्वी व समणी समुदाय ने अपने-अपने गीतों को दी प्रस्तुति
  • पंक्तिबद्ध चारित्रात्माओं ने किया लेखपत्र का उच्चारण
  • आचार्यश्री ने श्रावक-श्राविकाओं को भी कराया श्रावक निष्ठा पत्र का वाचन
  • संघगान के साथ सुसम्पन्न हुआ 162वां मर्यादा महोत्सव का भव्य आयोजन

छोटी खाटू, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान)। छोटी खाटू में पहली बार आयोजित जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के 162वें मर्यादा महोत्सव के शिखर दिवस पर तेरापंथ धर्मसंघ के शिखर पुरुष, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने चतुर्विध धर्मसंघ को मंगल पाथेय प्रदान किया। इसके उपरान्त तेरापंथाधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मानों सम्पूर्ण तेरापंथ धर्मसंघ पर विशेष कृपा करते हुए आगे की यात्रा व विहार के साथ-साथ वर्ष 2027 की अक्षय तृतीया, जन्मोत्सव, पट्टोत्सव, श्रीगंगानगर अंचल की यात्रा का वर्णन करने के उपरान्त पंजाबवासियों पर ऐसी महती कृपा बरसाई कि पंजाबवासियों हर्षविभोर हो उठे। आचार्यश्री ने वर्ष 2029 का मर्यादा महोत्सव चण्डीगढ़ में, वर्ष 2029 का चतुर्मास महाप्रज्ञ इण्टरनेशनल स्कूल-फागला, लुधियाना में करने की घोषणा की। इसके साथ ही आचार्यश्री पंजाब के अमृतसर आदि अनेकानेक स्थानों को स्पर्श करने की घोषणा करते हुए जम्मू व शिमला की यात्रा की भी घोषणा की।
आचार्यश्री की इस घोषणा ने मानों पूरे उत्तर भारत को भावविभोर कर दिया। तदुपरान्त आचार्यश्री ने कुछ साधु-साध्वियों के चतुर्मास व विहार आदि की घोषणा भी की। कुछ मुमुक्षु बहनों को साध्वी प्रतिक्रमण सीखने की अनुमति तो कुछ को साध्वी तो कुछ को समणी दीक्षा देने की तिथियों की भी घोषणा की। इस प्रकार मानों महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने चतुर्विध धर्मसंघ को मर्यादा महोत्सव के अंतिम दिन मानों अपनी घोषणाओं से निहाल कर दिया। माघ शुक्ला सप्तमी, तदनुसार 25 जनवरी, दिन रविवार। राजस्थान का छोटी खाटू नगर। तेरापंथ धर्मसंघ के महाकुम्भ मर्यादा महोत्सव के 162वें वर्ष त्रिदिवसीय समारोह का शिखर अर्थात् अंतिम दिन। पूरा मर्यादा समवसरण श्रद्धालुओं की उपस्थिति से जनाकीर्ण बना हुआ था। निर्धारित समय पर मंचस्थ युगप्रधान, तेरापंथ धर्मसंघ के शिखरपुरुष आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगल महामंत्रोच्चार किया। मुनि दिनेशकुमारजी ने जयघोष के साथ मर्यादा गीत का संगान किया। तदुपरान्त समणीवृंद, साध्वीवृंद व संतवृन्द पृथक्-पृथक् गीत का संगान किया। तेरापंथ धर्मसंघ की नवमी साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने उपस्थित जनता को उद्बोधित किया। तत्पश्चात तेरापंथ धर्मसंघ के शिखर पुरुष, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को मंगल पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि शास्त्र में अनुशासन को बहुत महत्त्व दिया गया है। मानव जीवन में अनुशासन बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। व्यक्तिगत और सामाजिक रूप में भी अनुशासन का अति महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। दुनिया में राजनैतिक, सामाजिक व धार्मि-आध्यात्मिक संगठन भी मिलते हैं। आज जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के 162वें मर्यादा महोत्सव के आयोजन को मनाने के लिए हम सभी यहां उपस्थित हैं।
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ जैन शासन की एक शाखा है। यह मुख्यतया धार्मिक-आध्यात्मिक संगठन है। नितांत सामाजिक संगठन नहीं है। धर्म और अध्यात्म पर आधारित यह संगठन है। इस संघ की अपनी मर्यादाएं और व्यवस्थाएं हैं। मर्यादाओं के संदर्भ में व व्यवस्थाओं के आलोक में आज का आयोजन हो रहा है। इसको प्रारम्भ हुए 161 वर्ष बीत गए हैं। यह 162वें वर्ष का आयोजन चल रहा है। इस समारोह का शुभारम्भ प्रज्ञा पुरुष श्रीमज्जयाचार्य ने किया था, किन्तु इस आयोजन का आधार यह मर्यादा पत्र है, जिसका सम्बंध आचार्यश्री भिक्षु स्वामी से है। इस पन्ने पर जो लिखत है, इस पर माघ शुक्ला सप्तमी तिथि उल्लिखित है। इससे लिखी हुई मर्यादाओं से संदर्भित यह आयोजन है। तेरापंथ धर्मसंघ के प्रथम आचार्य आचार्यश्री भिक्षु स्वामी हुए। उन्होंने जो विधान निर्धारित किया और एक आचार्य का विधान चला। उसके उपरान्त आचार्यों की परंपरा चली। वर्तमान में भी हमारा धर्मसंघ सुचारू रूप से चल रहा है। आचार्यश्री ने मर्यादा पत्र का वाचन करते हुए चारित्रात्माओं को उन मर्यादाओं का त्याग और पचखाण कराया। अध्यात्म का मूल तत्त्व आत्मा ही है। साधुपन तो आत्मा के कल्याण के लिए ही स्वीकार किया जाता है। जहां तक संभव को अपने साधुपन को अच्छा रखते हुए, दूसरों की सेवा का प्रयास हो। सबके प्रति शिष्टाचार व सद्भावना रखने का प्रयास करना चाहिए। आज्ञा के प्रति निष्ठा का भाव हो। पांच महाव्रत, पांच समितियां और तीन गुप्तियों की अखण्ड आराधना का प्रयास हो। जहां भी रहें, अपनी गलतियों की आलोयणा ले लेनी चाहिए।
आचार निष्ठा और मर्यादा निष्ठा के प्रति जागरूकता रहें। हमारे धर्मसंघ में मर्यादाओं का बहुत सम्यक् पालन हो रहा है। श्रावक समाज के लिए नियमावली बनी है, जो श्रावक संदेशिका के रूप में हैं। इसके श्रावक जीवन के व्यक्ति जीवन में की जाने वाली साधना तथा संस्थाओं आदि के संदर्भ में नियम हैं। कितने प्रश्नों का समाधान तो इससे प्राप्त हो सकता है। एक आचार, एक विचार, एक आचार्य, एक विधान और एक गुरु- ये पांच बातें एकता के सूत्र हैं। संगठन निर्मल रहे, संघ का विकास होता रहे, संघ का भविष्य अच्छा रहे। जहां तक संभव हो संघ की यथायोग्य सेवा करने का प्रयास करना चाहिए। शनिवार को सायं सात से आठ के बीच की सामायिक के प्रति भी काफी जागरूकता रखने का प्रयास हो। जैन विश्व भारती में हमारा योगक्षेम वर्ष के संदर्भ में लम्बा प्रवास निर्धारित है। यह योगक्षेम वर्ष की विकास व प्रशिक्षण का सुअवसर है, इसका लाभ उठाने का प्रयास होना चाहिए। आचार्यश्री ने आज के दिन के लिए हुए स्वरचित गीत का संगान किया। आचार्यश्री के साथ चतुर्विध धर्मसंघ ने भी गीत का संगान किया। गीत के बाद आचार्यश्री ने आगे कहा कि लाडनूं प्रवास के बाद विहार करना है। सरदारशहर में एक महीने के प्रवास, व श्री गंगानगर अंचल की यात्रा आदि का वर्णन करते हुए श्रीगंगानगर अंचल के रायसिंहनगर में वर्ष 2027 की अक्षयतृतीया तथा जन्मोत्सव व पट्टोत्सव का आयोजन श्रीगंगानगर में करने की घोषणा के साथ हनुमानगढ़ जिले में भी यात्रा के स्थानों का वर्णन किया।
तदुपरान्त आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पंजाबवासियों पर अपनी कृपा बरसानी प्रारम्भ की तो लगभग दस मिनट जब पंजाबवासी जनता को निहाल करते रहे। सर्वप्रथम आचार्यश्री ने पूर्वाचायों की वंदना करते हुए वर्ष 2029 का चतुर्मास महाप्रज्ञ इण्टरनेशनल स्कूल-फागला, लुधियाना में करने की घोषणा की। तदुपरान्त आचार्यश्री ने वर्ष 2029 का मर्यादा महोत्सव चण्डीगढ़ में करने की घोषणा की। इसके उपरान्त आचार्यश्री ने जम्मू व शिमला में भी यात्रा करने की घोषणा की। आचार्यश्री के सम्मुख पंजाबवासियों की भावनाओं को स्वीकार करते हुए आचार्यश्री ने जगराओ, सुनाम, अहमदगढ़, धुरी, अमृतसर, मलेरकोटला, लोंगोवाल, बरेटा, नाभा, भीखी, जेतोमण्डी, पातड़ा, भटिण्डा, गोविन्दगढ़, संगरूर, पंचकुला आदि-आदि अनेक क्षेत्रों में आने की घोषणा कर पंजाबवासियों को भावविभोर कर दिया। आचार्यश्री ने मुमुक्षु दिव्या, मुमुक्षु कोमल इन दोनों को साध्वी प्रतिक्रमण सीखने की अनुमति प्रदान की। मुमुक्षु प्रिया को 6 मार्च को साध्वी दीक्षा तथा मुमुक्षु भावना को 20 सितम्बर 2026 को समणी दीक्षा देने की घोषणा की। इसके साथ ही आचार्यश्री ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में विहरण कर रहे साधु-साध्वियों के विहार क्षेत्र व चतुर्मास क्षेत्रों की भी घोषणा की। तदुपरान्त आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में उपस्थित साधु, साध्वी समणीवृंद पण्डाल में पंक्तिबद्ध होकर लेखपत्र का उच्चारण किया। आचार्यश्री की आज्ञा से उपस्थित श्रावक समाज खड़ा हुआ और आचार्यश्री ने श्रावक निष्ठा पत्र का वाचन कर उनके संकल्पों को स्वीकार कराया। इस आयोजन में आचार्यश्री सहित 55 संत, 179 साध्वी समुदाय, 30 समणी समुदाय व 33 मुमुक्षु बहनों की उपस्थिति रही। आचार्यश्री ने संघगान करने के उपरान्त 162वें मर्यादा महोत्सव के सुसम्पन्नता की घोषणा की। इस प्रकार छोटी खाटू का यह मर्यादा महोत्सव जन-जन को आह्लादित करने वाला।

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