बेंगलुरु। श्री श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन श्रावक संघ ट्रस्ट एवं चातुर्मास समिति, हलसुरु के तत्वावधान में महावीर जैन भवन में आचार्य पार्श्वचंद्र आदि ठाणा-7 के सान्निध्य में गुरु पार्श्व-पदम चातुर्मास के अन्तर्गत श्रावक के 12 व्रत पर आधारित क्लास में डॉ. श्री पदमचन्द्रजी म.सा. ने कहा कि सम्यक्त्व का आधार किसी देवता का बाह्य स्वरूप, शस्त्र या वाहन नहीं, बल्कि सम्यक श्रद्धा, शुद्ध दृष्टि और आत्मकल्याण की भावना है। किसी लौकिक देवी-देवता के बाहरी स्वरूप के आधार पर उन्हें कु-देव मानना आगमसम्मत नहीं है।
यदि सामाजिक अथवा पारिवारिक कारणों से किसी लौकिक परंपरा का निर्वाह करना पड़े तो उसे केवल व्यवहार समझकर करें, धर्म नहीं। साथ ही किसी की श्रद्धा की आशातना या अनावश्यक विरोध से भी बचना चाहिए। जन्म से नहीं, बल्कि श्रद्धा, संस्कार और आचरण से बनता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म कायरता नहीं सिखाता। देश, धर्म, परिवार और शील की रक्षा के लिए आवश्यक कर्तव्य का पालन भी धर्ममर्यादा का ही अंग है। प्रत्येक विषय को अनेकांत दृष्टि से समझते हुए अंधश्रद्धा और मिथ्या धारणाओं से बचकर सम्यक दर्शन को जीवन में उतारना ही वास्तविक धर्म है।
प्रवचन के दौरान धर्मसभा को संबोधित करते हुए श्री जयधुरंधरमुनिजी म.सा. ने कहा कि मनुष्य जीवन के अधिकांश दुःखों का मूल कारण ईर्ष्या है। व्यक्ति स्वयं सुख चाहता है, लेकिन अनजाने में ऐसे भावों को पोषित करता रहता है जो उसके जीवन की शांति और प्रसन्नता को नष्ट कर देते हैं। ईर्ष्या का वास्तविक स्वरूप दूसरों के सुख को देखकर स्वयं दुःखी होना है। जब मनुष्य अपने पास उपलब्ध साधनों से संतुष्ट रहने के बजाय दूसरों की उन्नति और समृद्धि देखकर व्यथित होता है, तभी उसके भीतर अशांति जन्म लेती है। उन्होंने कहा कि जैन धर्म मनुष्य को मैत्री, मध्यस्थता, करुणा और संतोष का मार्ग अपनाने की प्रेरणा देता है। दूसरों के सुख में प्रसन्न होना मैत्री भाव है, जबकि किसी भी पीड़ित, असहाय अथवा प्रताड़ित जीव को देखकर उसके प्रति दया और अनुकंपा का भाव जागृत होना सच्ची मानवता है। यही करुणा आगे चलकर दान, सेवा और परोपकार का आधार बनती है। इसके विपरीत दूसरों के दुःख में आनंद अनुभव करना क्रूरता का परिचायक है। ऐसा भाव अंततः स्वयं के लिए भी दुःख का कारण बनता है, क्योंकि कर्म का नियम अटल है। मुनिश्री ने कहा कि परिवार, समाज और व्यापार में उत्पन्न होने वाले अधिकांश विवादों और कलह की जड़ भी ईर्ष्या ही है। तुलना, प्रतिस्पर्धा और दूसरों से आगे निकलने की मानसिकता मनुष्य को भीतर से खोखला कर देती है। यदि व्यक्ति संतोष और सद्भाव का मार्ग अपनाए, तो अनेक समस्याओं का समाधान स्वतः हो सकता है।
प्रवचन में उन्होंने एक प्रेरक दृष्टांत सुनाते हुए कहा कि एक व्यक्ति ने अपने घर में शुद्ध वायु और छाया के लिए एक विशाल वृक्ष लगाया। समय के साथ उसकी छाया पड़ोसी के घर तक भी पहुँचने लगी। सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति इस बात से प्रसन्न होगा कि उसके लगाए वृक्ष से अन्य लोगों को भी लाभ मिल रहा है, जबकि ईर्ष्यालु व्यक्ति इसी बात से दुःखी होगा कि उसकी वस्तु का लाभ पड़ोसी क्यों ले रहा है। उन्होंने कहा कि प्रकृति बिना किसी भेदभाव के सभी को छाया, शीतलता और जीवन प्रदान करती है। मनुष्य को भी वृक्षों की तरह उदार बनकर सभी के कल्याण की भावना रखनी चाहिए। इसके पश्चात श्री जयपुरंदरमुनिजी म.सा. ने आचार्य श्री जयमल म.सा. द्वारा रचित जीवा बयांलिसी की दूसरी कड़ी का विवेचन करते हुए कहा कि केवलज्ञानी भगवान त्रिकालदर्शी होते हैं। वे भूत, वर्तमान और भविष्य-तीनों काल का प्रत्यक्ष ज्ञान रखते हैं। वर्तमान जीवन के सुख-दुःख पूर्व कर्मों का परिणाम हैं, जबकि आज के कर्म भविष्य का निर्माण करते हैं। मुनिश्री ने भगवान महावीर के उपदेशों का उल्लेख करते हुए कहा कि जीव अनादिकाल से है। आत्मा का न जन्म होता है और न मृत्यु। जन्म और मरण केवल शरीर के होते हैं, जबकि आत्मा अजर, अमर, अविनाशी और शाश्वत है। उन्होंने कहा कि मनुष्य जन्मदिन मनाकर प्रसन्न होता है, जबकि वास्तव में उसके जीवन का एक वर्ष कम हो जाता है। इसलिए प्रत्येक क्षण को धर्म, संयम और आत्मकल्याण में लगाना ही बुद्धिमानी है। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन के अनुसार जीव और लोक दोनों अनादि हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति और त्रस जीवों में चेतना का अस्तित्व स्वीकार किया गया है। जल भी जीवकाय है, इसलिए प्रत्येक जीव के प्रति संवेदनशीलता, करुणा और अहिंसा का भाव रखना जैन धर्म की मूल भावना है। उन्होंने कहा कि संसार में सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर अनेक मत हैं, किंतु भगवान महावीर ने अनेकांतवाद के आधार पर सत्य का प्रतिपादन करते हुए प्रत्येक प्रश्न का उत्तर अपेक्षानुसार दिया।
ईर्ष्या मनुष्य के सुख और शांति की सबसे बड़ी शत्रु : श्री जयधुरंधरमुनिजी म.सा.

