- अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के अंतर्गत अनुशासन दिवस आयोजित
- मुनि भरतकुमारजी द्वारा मासखमण तप का प्रत्याख्यान
06.10.2026, मंगलवार, लाडनूं। अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के छठे दिन आज ‘अनुशासन दिवस’ का आयोजन युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के पावन सान्निध्य में हुआ। इस अवसर पर सूरजमल तापड़िया संस्कृत विद्यालय के विद्यार्थी एवं शिक्षकगण विशेष रूप से उपस्थित रहे। विद्यार्थियों ने आचार्य प्रवर से नैतिकता, सद्भावना एवं नशामुक्ति के संकल्प स्वीकार किए। विद्यालय के छात्र भैया देवेश वासु ने संस्कृत संभाषण प्रस्तुत किया।
सुधर्मा सभा में जनमेदिनी को संबोधित करते हुए अणुव्रत अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि अनुशासन के दो आयाम होते हैं, आत्मानुशासन और परानुशासन। स्वानुशासन को हम निज प्रशासन भी कह सकते हैं। दूसरों पर अनुशासन करना उपयोगी और लाभदायक हो सकता है, परंतु परानुशास्ता होने के लिए स्वयं का स्वानुशासित होना सबसे अधिक अपेक्षित है। जो व्यक्ति खुद पर अनुशासन नहीं कर सकता, वह दूसरों पर अनुशासन किस प्रकार कर सकेगा। पहले स्वयं पर अनुशासन करना सीखना चाहिए। जो व्यक्ति स्वानुशासी है, उसका परानुशासन अधिक प्रभावी बन सकता है। स्वयं से अनुशासन की शुरुआत होनी चाहिए। जहाँ व्यक्तियों का समूह होता है, वहाँ प्रबंधन और प्रशासन अपेक्षित होता है। राजतंत्र हो या लोकतंत्र, दोनों में अनुशासन की अपेक्षा रहती है। बिना कर्तव्य और अनुशासन के लोकतंत्र विनाश को प्राप्त हो सकता है। भारत का संविधान व्यवस्था का मेरुदंड है, और इसका पालन कराने के लिए न्यायपालिका और दंड संहिता की भी आवश्यकता होती है। यदि नियम हैं पर दंड का प्रावधान नहीं है, तो समाज में अराजकता फैल सकती है। अनुशासन का उद्देश्य किसी को कष्ट देना नहीं, बल्कि व्यवस्था को सुचारू रखना और विकास सुनिश्चित करना है। अनुशासन में निष्पक्षता, निर्भीकता और विवेक का होना अनिवार्य है, ताकि सभी को यह लगे कि नियम सबके लिए समान हैं। यदि गलती करने वाले को यथायोग्य दंड मिलता है, तो दूसरे लोग भी सचेत हो जाते हैं।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि हमारे धर्मसंघ में आचार्य भिक्षु से अनुशासन का जो क्रम शुरू हुआ, वह आज भी निरंतर प्रवाहित है। अनुशासन का अर्थ केवल कड़ाई नहीं है, बल्कि सौहार्द और स्नेह का भाव भी इसके साथ रहना चाहिए। हमारे यहाँ साधु-साध्वियों का जीवन अनुशासित है, जो एक बहुत बड़ी बात है। उच्च शिक्षित, डॉक्टरेट उपाधि प्राप्त या प्रखर वक्ता होने के बावजूद सभी एक अनुशासन की मर्यादा में रहते हैं। गुरु की आज्ञा का पालन करना और परस्पर सहयोग की भावना रखना हमारे धर्मसंघ की बड़ी विशेषता है। ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ का सूत्र यहाँ चरितार्थ होता है, जहाँ सब एक-दूसरे का आलंबन बनकर सेवा और सहयोग करते हैं, ताकि किसी को भी असुविधा न हो। हमारा ध्येय ‘सेवा अस्माकं धर्मः’ है, चाहे वह अस्वस्थ की सेवा हो या व्यवस्थाओं को सँभालने का दायित्व। आज अनुशासन दिवस के अवसर पर सभी में आत्मानुशासन के संस्कार पुष्ट बने यह अपेक्षा है।
कार्यक्रम में मुनि भरतकुमारजी ने 27 दिन की तपस्या मासखमण का गुरुदेव से प्रत्याख्यान किया। श्री विजय कृष्ण नाहर ने अपनी नवीन पुस्तक ‘ज्योतिपुरुष महर्षि जयाचार्य’ पूज्यचरणों में लोकार्पित की एवं अपने विचारों को अभिव्यक्ति दी।


