23.05.2026, शनिवार, लाडनूं। जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले, अहिंसा यात्रा प्रणेता, तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्तमान समय में राजस्थान के डीडवाना-कुचामन जिले में स्थित लाडनूं नगर में विराजमान हैं। लाडनूं नगर तेरापंथ समाज में तेरापंथ की राजधानी के रूप में भी घोषित है। इसलिए ऐसा भी कहा जा सकता है कि तेरापंथ की राजधानी में तेरापंथ के वर्तमान अधिशास्ता विराजमान हैं। जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में योगक्षेम वर्ष का मंगल प्रवास कर रहे युगप्रधान अनुशास्ता की मंगल सन्निधि में इस समय देश के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में बालक-बालिकाएं उपस्थित हैं, जो सघन साधना शिविर में संभागी बन रहे हैं। यह भावी पीढ़ी अपने आराध्य की सन्निधि में अपने जीवन में साधना और संस्कारों के गुणों का विकास कर रही है, जो इनके भविष्य को नई दिशा प्रदान करने वाला बन सकता है।
शनिवार को मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में चतुर्विध धर्मसंघ के साथ-साथ सघर साधना शिविर के शिविरार्थियों की उपस्थिति से मानों पूरा सुधर्मा सभा जनाकीर्ण-सा बना हुआ था। महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘वह त्राण नहीं दे सकता’ पर प्रकाश डालते हुए कहा कि त्राण और शरण की बात आगमों में प्राप्त होती है। शरण तो इतना प्रसिद्ध शब्द है कि चारित्रात्माओं के मुख से न जाने कितनी बात उच्चरित होता है। त्राण शब्द भी आगम में उपलब्ध होता है। दुनिया में त्राण और शरण कौन बन सकता है? किसी राजा को कहा गया कि यदि दुनिया का सारा राज्य और सारा धन तुम्हें दे दिया जाए तो वह भी तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं हो सकता, अपर्याप्त ही रहेगा। किसी एक आदमी की इच्छापूर्ति के लिए सारे जगत् का धन मानों कम पड़ सकता है। इतना ही इतना सारा धन और यह जगत उस राजा के लिए क्या किसी के लिए भी त्राण देने वाला नहीं बन सकता। परलोक में जाने पर धन और जगत त्राण नहीं दे सकता। जब आदमी के जीवन का अवसान हो जाता है तो धन और संपत्ति भी सभी पीछे रह जाते हैं।
सामान्य आदमी क्या भगवान महावीर से लेकर, आचार्यश्री भिक्षु आदि-आदि महापुरुष भी महाप्रयाण कर गए, किसी को अंतिम त्राण नहीं बन सकता, जो मृत्यु से बचा ले। आयुष्य पूर्ण हो जाने किसी को बचाया नहीं जा सकता। इसके लिए शास्त्र में बताया गया है कि इस संसार में धर्म एक त्राण बन सकता है। धर्म की आराधना करने से पाप कर्मों से बच सकते हैं, फिर आगे दुःख की स्थिति से बचाव हो सकता है। पाप कर्मों से बचाने के धर्म ही समर्थ हो सकता है। इसकी आराधना करने वाला का कल्याण हो सकता है। अहिंसा, संयम और तप रूपी साधना करने वाले जीवों को त्राण मिल सकता है। इस प्रकार धर्म करने वालों को लाभ मिल सकता है। इसलिए धर्म की साधना के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए।आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त सरदारशहर से संबंधित साध्वीवृंद और समणीवृंद ने संयुक्त रूप से आचार्यश्री की अभ्यर्थना में गीत का संगान किया। शासन गौरव साध्वी राजीमतीजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। साध्वी देवार्यप्रभाजी व साध्वी मनोज्ञयशाजी ने संयुक्त रूप से अभिव्यक्ति दी।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में उपस्थित सघन साधना शिविर के शिविरार्थियों ने अपनी जिज्ञासाओं प्रस्तुत किया तो आचार्यश्री ने सभी की जिज्ञासाओं के उत्तर प्रदान किए। तेरापंथी सभा-कोलकाता के अध्यक्ष श्री अजय भंसाली ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। बृहद् कोलकाता एवं दक्षिण बंगाल ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी प्रस्तुति दी। ज्ञानशाला की प्रशिक्षिकाओं ने भी गीत का संगान किया।

