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देश में भीख मांगना एक सामाजिक बुराई. इसे समाप्त करने की आवश्यताः न्यायमूर्ति सारंगी

Last updated: February 25, 2026 10:55 pm
Surabhi Saloni
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6 Min Read
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नयी दिल्ली। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी ने भीख मांगने की प्रथा को समाप्त करने की वकालत करते हुए कहा कि यह एक सामाजिक बुराई है और देश में यह एक गंभीर समस्या बनी हुई है। न्यायमूर्ति सारंगी ने ‘भिक्षावृत्ति पर पुनर्विचार: नीति, व्यवहार और गरिमा के बीच की खाई को पाटना’ विषय पर हाइब्रिड मोड में खुली चर्चा की अध्यक्षता करते हुए कहा कि भीख मांगना एक सामाजिक बुराई है और देश में यह एक गंभीर समस्या बनी हुई है। उन्होंने कहा कि आज विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत में भी भीख मांगने की समस्या का बने रहना एक गहरी संरचनात्मक और सामाजिक चुनौती को दर्शाता है, जिस पर तत्काल और निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्होंने भीख मांगने को केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं बल्कि एक सामाजिक बीमारी बताया जो समाज के कमजोर वर्गों की गरिमा और संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित करती है।
उन्होंने जोर देते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत कानून के समक्ष समानता के अधिकार का संवैधानिक वादा सभी नागरिकों के लिए सार्थक रूप से पूरा किया जाना चाहिए, जिसमें भीख मांगने वाले भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षित, संरक्षित और गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार है। उन्होंने बताया कि कई राज्यों ने भीख मांगने की समस्या से निपटने के लिए कानून बनाए हैं। हालांकि, केवल कानूनी प्रावधानों का होना ही पर्याप्त नहीं है।
न्यायमूर्ति सारंगी ने कहा कि यह जांच करना आवश्यक है कि भीख मांगने में संलग्न गरीब, अशिक्षित बच्चों, महिलाओं और दिव्यांगजनों के संरक्षण और पुनर्वास से संबंधित राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सलाह (2024) और भारत सरकार की स्माइल-बी योजना (आजीविका और उद्यम के लिए हाशिए पर रहने वाले लोगों को सहायता) के इच्छित उद्देश्यों से सार्थक परिवर्तन हुआ है या नहीं। उन्होंने इन उपायों की प्रगति की समीक्षा करने और कार्यान्वयन में कमियों की पहचान करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भिक्षावृत्ति को कम करने और अंततः समाप्त करने के लिए समानता, गरिमा और सामाजिक सुरक्षा के संवैधानिक मूल्यों पर आधारित अधिकार-आधारित और पुनर्वास-उन्मुख रणनीति की जरूरत है।
एनएचआरसी की सदस्य विजया भारती सयानी ने भीख मांगने के संदर्भ में महिलाओं, बच्चों और श्रम से संबंधित मुद्दों के समाधान के लिए स्पष्ट समयसीमा और जवाबदेही तंत्र के साथ एक समन्वित राष्ट्रीय रणनीति की तत्काल जरूरत पर बल दिया। उन्होंने राष्ट्रीय पोर्टल विकसित करने और व्यापक डेटा सर्वेक्षण करने के महत्व पर बल देते हुए कहा कि विश्वसनीय डेटा के बिना प्रभावी नीति निर्माण संभव नहीं है। उन्होंने भीख माफियाओं और मानव तस्करी नेटवर्क के खिलाफ सख्त कार्रवाई का आह्वान किया। साथ ही, इस बात पर जोर दिया कि अल्पकालिक, अस्थायी उपायों के बजाय दीर्घकालिक पुनर्वास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
आयोग के महासचिव भरत लाल ने इस बात पर जोर दिया कि भारत अपने सुदृढ़ कानूनी ढांचे और संवैधानिक मूल्यों के लिए जाना जाता है, जो सभी नागरिकों के सम्मान और अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी अधिकारी अकेले इस उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकते और उन्हें गैर-सरकारी संगठनों और नागरिक समाज संगठनों के साथ मिलकर काम करना होगा।
श्री लाल ने इस मुद्दे को एक अभियान के रूप में उठाने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि समावेशी भारत में किसी को भी पीछे नहीं छोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अधिकारियों को लोगों से सरकारी कार्यालयों में आने की अपेक्षा करने के बजाय, आधार कार्ड जारी करने के लिए स्वयं पहल करनी चाहिए। उन्होंने भीख मांगने वाले लोगों की पहचान करने और उन्हें कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने और उन पर ध्यान केंद्रित करने के महत्व को भी रेखांकित किया।
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की वरिष्ठ आर्थिक सलाहकार योगिता स्वरूप ने भीख मांगने वाले लोगों से संबंधित 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर प्रकाश डाला और उनके पुनर्वास, शिक्षा एवं कौशल विकास के उद्देश्य से शुरू की गई प्रमुख पहलों, जिनमें स्माइल योजना भी शामिल है, की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने सभा को भीख मांगने से संबंधित मामलों में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन के बारे में जानकारी दी और गरिमा एवं सतत पुनर्एकीकरण पर केंद्रित “भीख मुक्त भारत” के दृष्टिकोण को दोहराया।
भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) के उप महानिदेशक शैलेंद्र सिंह ने जरूरतमंद लोगों, विशेषकर बच्चों और दिव्यांगजनों को आधार कार्ड उपलब्ध कराने के लिए यूआईडीएआई की पहलों पर प्रकाश डाला, जिससे वे सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठा सकें।
उन्होंने नामांकन प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के परामर्श से जारी की गई दो मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) के बारे में प्रतिभागियों को जानकारी दी। उन्होंने आश्रय गृहों में यूआईडीएआई के आयोजित जागरूकता शिविरों के साथ-साथ इन प्रक्रियाओं के व्यापक प्रसार की जरूरत पर बल दिया।

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