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ब्यावर की धरा पर शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण का मंगल पदार्पण

Last updated: January 3, 2026 8:47 pm
Surabhi Saloni
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5 Min Read
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Highlights
  • 9 कि.मी. का विहार कर ब्यावर के नानेश रत्नम भवन में पधारे युगप्रधान आचार्यश्री
  • इच्छाओं के अल्पीकरण का हो प्रयास : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
  • ब्यावरवासियों को साध्वीप्रमुखाजी ने भी किया अभिप्रेरित
  • ब्यावरवासियों ने दी भावनाओं को अभिव्यक्ति, प्राप्त किया मंगल आशीष

ब्यावर (राजस्थान)। गुजरात की धरा पर लगातार दो चतुर्मास सुसम्पन्न कर राजस्थान की धरा पर गतिमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी शनिवार को अपनी धवल सेना के साथ ब्यावर जिला मुख्यालय पर पधारे तो ब्यावरवासियों ने अपने आराध्य का भावपूर्ण स्वागत-अभिनंदन किया। भव्य स्वागत जुलूस में लगते बुलंद जयघोष श्रद्धालुओं के श्रद्धाभावों को अभिव्यक्त कर रहे थे। ब्यावर नगर का मानों कोना-कोना महाश्रमणमय बना हुआ था।
सभी नगरवासी मानों मानवता के मसीहा के दर्शन को उमड़ आए थे। मार्ग के दोनों ओर करबद्ध खड़े दर्शनार्थियों पर मंगल आशीष की वर्षा करते हुए युगप्रधान आचार्यश्री अपनी धवल सेना के साथ ब्यावर नगर में स्थित नानेश रत्नम भवन में पधारे। आचार्यश्री का एकदिवसीय प्रवास प्राप्त कर ब्यावरवासी मानों उत्फुल्ल बने हुए थे। इसके पूर्व शनिवार को प्रातःकाल की मंगल बेला में युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने रात्रिकालीन प्रवास स्थल लालपुरा स्थित अग्रवाल रिसोर्ट से गतिमान हुए। सर्दी के मौसम में भी अपने आराध्य के आगमन की खुशी में ब्यावर के उत्साही श्रद्धालु मार्ग में ही पहुंच रहे थे। आचार्यश्री लगभग नौ कि.मी. का विहार कर ब्यावर में स्थित नानेश रत्नम भवन में पधारे।
इसी परिसर में शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित श्रद्धालु जनता को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आदमी के भीतर कषाय और राग-द्वेष का भाव भी होता है। चार कषायों में लोभ कषाय ऐसा तत्त्व है जो सबसे बाद में क्षय को प्राप्त होता है। लोभ अनेक पापों का कारण बनता है। आदमी में भौतिक आकांक्षाएं बढ़ती जाती हैं। कहा जाता है कि आदमी को सोने व चांदी के असंख्य पर्वत भी मिल जाएं तो भी लोभी आदमी इच्छा की पूर्ति नहीं हो सकती। इच्छा आकाश के समान अनंत होती है।

लालसा जितनी होती है और उसके अनुरूप प्राप्त नहीं होने पर आदमी के मन में दुःख हो सकता है, गुस्सा भी आ सकता है। इसलिए आदमी को अपनी इच्छाओं का अल्पीकरण करने का प्रयास करना चाहिए। जिस आदमी की सारी इच्छाएं समाप्त हो जाएं, वह तो अनिच्छ हो गया।
बहुत ज्यादा इच्छाओं वाला आदमी महेच्छ हो जाता है और इच्छाओं का अल्पीकरण हो जाए तो आदमी अल्पेच्छ बन जाता है।

गृहस्थ जीवन में अनिच्छ हो जाना तो कठिन है, किन्तु अल्पेच्छ बनने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपनी इच्छाओं का अल्पीकरण करने का प्रयास करना चाहिए। जैन साधना पद्धति के बारह व्रतों में पांचवां व्रत इच्छा परिमाण व्रत है। इसमें आदमी अपनी इच्छाओं का अल्पीकरण करने का प्रयास करता है। आदमी अपने जीवन में इच्छाओं को कम करे। आदमी यह विचार कि उसे आवश्यकता कितनी है और इच्छाएं कितनी हैं। दो-चार जोड़ी वस्त्र से वर्ष निकल सकता है तो बहुत ज्यादा वस्त्र आदि क्रय करने से क्या लाभ।
आदमी का जीवन संयम प्रधान होना चाहिए। संयम बहुत अच्छा तत्त्व है। आदमी अपनी इच्छाओं के साथ-साथ अपनी वाणी का संयम करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने आगे कहा कि परम पूज्य आचार्यश्री तुलसी जब ब्यावर पधारे थे, तब उनके साथ यहां आना हुआ था। परम पूज्य आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के साथ भी आना हुआ था। उसके बाद लगभग सोलह-सत्रह वर्षों में पहली बार आना हुआ है। ब्यावर की समस्त जनता में अहिंसा, त्याग, तप आदि की भावना बनी रहे, इनकी आराधना करने का प्रयास हो और जनता में शांति रहे। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वीप्रमुखाजी ने ब्यावर की जनता को उद्बोधित किया। आचार्यश्री के स्वागत में मुमुक्षु रिचा सांखला ने अपनी अभिव्यक्ति दी। ब्यावर ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी। आचार्यश्री ने ज्ञानार्थियों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। स्थानीय तेरापंथी सभा की ओर से श्री रमेश श्रीश्रीमाल ने अपनी अभिव्यक्ति दी। स्थानीय तेरापंथ महिला मण्डल ने स्वागत गीत का संगान किया। श्री गौतम गोखरू, प्रवास स्थल भवन की ओर से श्री गौतम चौधरी, स्थानीय तेरापंथ युवक परिषद के अध्यक्ष श्री मुकेश रांका, श्रीमती चन्द्रकांता रांका ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी।

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