- आचार्यश्री ने ‘न रुष्ट हों न तुष्ट’ विषय को आगम के माध्यम से किया व्याख्यायित
- चारित्रात्माओं को अपनी जिज्ञासाओं के प्राप्त हुए उत्तर
21.07.2026, मंगलवार, लाडनूं । जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगलवार को सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम के दौरान उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आगम के माध्यम से आज के निर्धारित विषय ‘न रुष्ट हों न तुष्ट’ को व्याख्यायित करते हुए कहा कि भगवान पार्श्व की परंपरा के घोर पराक्रमी मुनि केशी कुमारश्रमण व भगवान महावीर की परंपरा के गौतम स्वामी के बीच हुए प्रश्नोत्तरों के माध्यम से अनेक जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त हुआ।
गौतम स्वामी से समाधान प्राप्त करने के बाद मुनि कुमारश्रमण केशी ने शीश झुकाकर नमस्कार किया गया। मुनि कुमारश्रमण केशी को घोर पराक्रमी कहा गया है। परम पूज्य आचार्यश्री तुलसी को देखें तो वे एक शेषकाल में कोलकाता से केलवा पधार गए थे। वह भी एक प्रकार का पराक्रम था। विहार करना भी बहुत बड़ा पराक्रम है। वह यात्रा उनके जीवनकाल की प्रलम्बतम यात्रा थी। उसके साथ-साथ प्रवचन आदि-आदि कार्य भी थे।
प्रत्येक चारित्रात्मा को भी अपने जीवन में पराक्रम करने का प्रयास करना चाहिए। पढ़ाने में, उपदेश देने में, प्रवचन में और भी किसी भी कार्य में पराक्रम करने का प्रयास करना चाहिए। गौतमजी से चर्चा वार्तालाप करने के उपरान्त मुनि केशी कुमारश्रमण ने पंच शिक्षात्मक (पंच महाव्रतात्मक) धर्म को स्वीकार कर लेते हैं और पूर्व से पश्चिम में आ जाते हैं। भगवान पार्श्व पूर्व वाले तो भगवान महावीर पश्चिम वाले हैं। दोनों पंथों में एकता हो गई। संतों के इस महान समागम से कितनों को लाभ प्राप्त हुआ। इसमें श्रुत और शील का मानों उत्कर्ष हुआ। वहां उपस्थित परिषद को भी संतोष प्राप्त हुआ।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि कभी कहीं कोई संत गोचरी, पानी के लिए जाए और वहां उसके अनुकूल आहार-पानी न मिले अथवा कोई गोचरी आदि से मना कर दे तो भी उसे गुस्सा नहीं होना चाहिए। गृहस्थ के घर में बहुत कुछ होने पर भी यदि वह नहीं दे तो भी साधु को कुपित नहीं होना चाहिए। इस भिक्षा का निषेध किए जाने पर रोष में नहीं आना चाहिए। जीवन में अनुकूल स्थिति आए या प्रतिकूल परिस्थिति आए, दोनों ही परिस्थितियों में समता रखने का प्रयास करना चाहिए। कोई दे भी दे तो ज्यादा संतुष्ट नहीं होना और नहीं दे तो रुष्ट भी नहीं होना चाहिए। देने वाले की प्रशंसा और न देने वाले की निंदा, ऐसा भी प्रयास नहीं होना चाहिए। साधु को भिक्षु के लिए प्रशंसा करना पड़े, ऐसा भी नहीं होना चाहिए। साधु को समता में रहने का प्रयास करना चाहिए। न रुष्ट होना और न ही तुष्ट होना, यह समता का एक सूत्र बन सकता है। कहीं स्थान मिले अथवा न मिले तो भी कोई बात नहीं, अपनी समता और शांति को बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। महामना आचार्यश्री भिक्षु के जीवन से भी समता और शांति की प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं।
मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री चारित्रात्माओं को अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया तो अनेक चारित्रात्माओं की अपनी जिज्ञासाएं रखीं, जिन्हें आचार्यश्री ने उत्तरित किया।

