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Reading: अध्यात्म-ध्यान योगों द्वारा कषायों को करें उपशांत : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
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अध्यात्म-ध्यान योगों द्वारा कषायों को करें उपशांत : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

Last updated: June 18, 2026 6:46 pm
Surabhi Saloni
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4 Min Read
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Highlights
  • आचार्यश्री ने आज के निर्धारित विषय के माध्यम से दी मंगलमयी प्रेरणा
  • चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं को भी आचार्यश्री ने किए उत्तरित

लाडनूं । जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को आज के निर्धारित विषय ‘अध्यात्म-ध्यान योग’ को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए कहा कि आश्रव एक ऐसा तत्त्व है, जो अशुभ भी होता है और शुभ भी होता है। मिथ्यात्व, अव्रत, प्रमाद व कषाय एकान्ततः अशुभ और अप्रशस्त होते हैं। योग आश्रव दोनों ही प्रकार का होता है। यह अप्रशस्त और प्रशस्त भी होता है। अशुभ योग आश्रव होता है और शुभ योग आश्रव भी होता है।
शुभ योग से दो कार्य होते हैं। शुभ योग से कर्म निर्जरा और पुण्य का बंध भी होता है। चिंतन का यह विषय हो सकता है कि क्या पुण्य बंध निर्जरा का कारण है? शास्त्र में बताया गया कि शुभ योग को मूल कारण मान लें तो वहां से दो शाखाएं निकलती हैं एक शाखा निर्जरा की और दूसरी शाखा पुण्य बन्ध की। शुभ योग से दो कार्य होते हैं। दोनों का आधार एक ही होता है। शुभ योग में कर्म का उदय और कर्म का विलय भी सहयोगी होता है। कर्म विलय के कारण से निर्जरा होती है और नाम कर्म के उदय से पुण्य का बंध होता है। पहले पुण्य का बंध होता है और उसके बाद निर्जरा होती है। दोनों का कार्य प्रारम्भ साथ ही होता है, दोनों की निष्पत्ति में थोड़े समय का अंतर होता है। शुभ योग आश्रव है तो अपने आप में पुण्य का बंध कराने वाला होता है। मिथ्यात्व, अव्रत, प्रमाद व कषाय-इन चारों को अप्रशस्त द्वार कहा गया है। साधु को अप्रशस्त द्वारों को रोकने का प्रयास किया जा सकता है। चौदहवें गुणस्थान वाला जीव अबन्ध होता है। वहां पुण्य का बंधन भी नहीं होता। सिद्धावस्था में भी अबन्ध की स्थिति बनी रहती है।
अध्यात्म-ध्यान योगों से प्रशस्त दम शासन वाला होता है। दम करने का अर्थ दमन रूप में होता है। उपशम की साधना के द्वारा कषायों का दमन करना और साधना प्रशस्त हो। मन की दो स्थितियां होती हैं- एक होता है व्यग्र मन और एक होता है एकाग्र मन। जब मन विविध आलम्बनों पर जाता है तो वह मन की चंचलता की अवस्था होती है। एक ही आलम्बन पर मन केन्द्रित हो जाए तो वह मन की एकाग्र अवस्था हो जाती है। कभी अमन की अवस्था आ जाए। साधना करते-करते कभी मन अमन भी बन सकता है। अध्यात्म-ध्यान योगों के द्वारा कैसे कषाय नियंत्रण और चेतना विशुद्धि की आराधना, साधना कर सकें, इसका प्रयास अथवा चिंतन करना चाहिए।

द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की अनुकूलता को देखकर ध्यान आदि का प्रयोग करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को जब जितना समय मिले, ध्यान कर लेने का प्रयास करना चाहिए। कहीं भी स्थिर होकर आदमी को ध्यान कर लेने का प्रयास करना चाहिए। आहार करते-करते भी चित्त की स्थिरता का प्रयोग किया जा सकता है। सोने से पहले भी ध्यान का प्रयोग किया जा सकता है। अध्यात्म, ध्यान योगों के द्वारा कषायों को उपशांत करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने अपने मंगल प्रवचन के उपरान्त चारित्रात्माओं को अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया तो अनेक चारित्रात्माओं ने अपनी जिज्ञासाओं को प्रस्तुत किया, जिसे आचार्यश्री ने उत्तरित किया।

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