चीन से भरतकुमार सोलंकी की कलम से
पूंजीवाद और समाजवाद आधुनिक विश्व की दो प्रमुख आर्थिक विचारधाराएं रही हैं। एक ओर निजी स्वामित्व, उद्यमिता, प्रतिस्पर्धा और बाजार को महत्व देने वाला पूंजीवाद रहा, तो दूसरी ओर उत्पादन और संसाधनों पर राज्य की प्रमुख भूमिका तथा आर्थिक समानता को केंद्र में रखने वाला समाजवाद। बीसवी सदी के लंबे दौर में इन दोनों व्यवस्थाओं के बीच वैचारिक संघर्ष चलता रहा। लेकिन समय के साथ दुनिया के अनेक देशों ने महसूस किया कि अर्थव्यवस्था को केवल विचारधारा के चश्मे से नहीं, बल्कि उसके परिणामों से भी देखना होगा।
1989 इस परिवर्तन का महत्वपूर्ण प्रतीक जरूर बना, लेकिन इसकी शुरुआत उससे पहले हो चुकी थी। चीन ने 1978 से ही आर्थिक सुधारों और खुलेपन की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। कृषि में सुधार, विशेष आर्थिक क्षेत्र, विदेशी निवेश, निजी उद्यम और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को धीरे-धीरे बढ़ावा दिया गया। चीन ने समाजवादी राजनीतिक व्यवस्था को बनाए रखते हुए बाजार की शक्तियों को अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान दिया। यही प्रयोग आगे चलकर उसकी आर्थिक वृद्धि का प्रमुख आधार बना।
दूसरी ओर सोवियत संघ में मिखाइल गोर्बाचेव ने 1980 के दशक में पेरेस्त्रोइका और ग्लासनोस्त के माध्यम से व्यवस्था में व्यापक बदलाव की शुरुआत की। 1989 में पूर्वी यूरोप में साम्यवादी शासन के कमजोर होने और उसके बाद सोवियत संघ के विघटन ने विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था का संतुलन बदल दिया। लेकिन चीन का रास्ता अलग था। उसने राजनीतिक व्यवस्था को बदलने के बजाय आर्थिक व्यवस्था में बाजार की भूमिका लगातार बढ़ाई।
भारत में निर्णायक परिवर्तन 1991 के आर्थिक सुधारों के साथ आया। आर्थिक संकट के बीच उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की दिशा में कदम उठाए गए। लाइसेंस और नियंत्रण आधारित व्यवस्था में बदलाव आया, निजी क्षेत्र को अधिक अवसर मिले और विदेशी निवेश तथा वैश्विक व्यापार के लिए अर्थव्यवस्था खोली गई।
आज चीन, भारत, रूस और अमेरिका को केवल ‘पूंजीवादी’ या ‘समाजवादी’ कहकर समझना आसान नहीं है। वास्तविकता यह है कि आधुनिक अर्थव्यवस्थाओं में राज्य और बाजार दोनों की भूमिका मौजूद है। चीन में सरकारी कंपनियों के साथ विशाल निजी क्षेत्र है, भारत में निजी उद्योग के साथ मजबूत सार्वजनिक क्षेत्र और कल्याणकारी योजनाएं हैं, जबकि अमेरिका में भी बाजार के साथ सरकारी नियमन मौजूद है।
पूंजीवाद का बढ़ता प्रभाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उसने निवेश, प्रतिस्पर्धा, उद्यमिता, तकनीक, नवाचार और वैश्विक व्यापार को गति दी। लेकिन पूंजीवाद अपने आप में हर समस्या का समाधान नहीं है। असमानता, श्रमिक सुरक्षा, एकाधिकार, पर्यावरण और सामाजिक सुरक्षा जैसे प्रश्नों के लिए प्रभावी सरकारी नीति भी आवश्यक है।
मेरे विचार में आने वाले समय की बहस पूंजीवाद बनाम समाजवाद से आगे बढ़कर राज्य और बाजार के सही संतुलन की होनी चाहिए। चीन और भारत के अनुभव बताते हैं कि आर्थिक व्यवस्था का मूल्यांकन उसके नाम से नहीं, बल्कि इस बात से होना चाहिए कि वह रोजगार, आय, निवेश, उत्पादन और आम नागरिक के जीवन स्तर में कितना सुधार ला पाती है। विचारधारा साधन हो सकती है, लेकिन आर्थिक विकास का अंतिम उद्देश्य मानव जीवन को बेहतर बनाना होना चाहिए।
— भरतकुमार सोलंकी, वित्त विशेषज्ञ

