वसई। वसई गांव में परम श्रद्धेया दक्षिण सिंहनी अजितकुमारी जी म.सा. की सुशिष्या अगम ज्ञाता साहित्य रसिका पूज्य साध्वी विश्ववंदना जी म.सा. एवं विद्याभिलाषी साध्वी परमेष्ठी वंदना जी म. सा. के चातुर्मास में निरंतर ज्ञान की गंगा बह रही हैं जिनवाणी श्रवण सभी श्रोतागण करके अपनी आत्मा का कल्यान करने का प्रयास कर रहे हैं। इसी ज्ञान की गंगा में साध्वी परमेष्ठी वन्दनजी ने कहा है कि हमें हमारी लाइफ में कभी भी दो चीजों को याद नहीं रखना चाहिए और दो चीजों को कभी भूलना भी नहीं चाहिए। दो चीजें जो कभी भूलनी नहीं हैं वह हैं – पहला भगवान और दूसरा मृत्यु को। इन दोनों चीजों को हमें कभी भी नहीं भूलना चाहिए। यदि ये दो बातें आपको याद नहीं रहती, आपकी मेमोरी बहुत ज्यादा कमजोर है तो हम दो बातों में से केवल एक बात याद रख सकते हैं।
साध्वी परमेष्ठी वंदना जी ने कहा कि आप भगवान को याद न रखें, आप मृत्यु को याद रखें। यदि आप भगवान को याद रखेंगे तो मृत्यु को याद रखना आपके लिए पॉसिबल नहीं है परंतु आप म्रत्यु को याद रखोगे तो भगवान की हर पल याद आएगी। हमें दो लोगों को नाराज नहीं करना चाहिए। पहला भगवान और दूसरा डॉक्टर। भगवान को कभी नाराज मत करना। क्योंकि भगवान नाराज हुए तो डॉक्टर के पास भेज देंगे। और अगर डॉक्टर नराज हुआ तो डॉक्टर के पास भेज देगा। इसलिए हमें इन दोनों लोगों को कभी नाराज नहीं करना चाहिए। नाराज मत करना अपने घर के बड़े बुजुर्गों को। हमें अपने बड़े बुजुर्गों पर सर्फ गर्व ही नहीं करना है अपितु हम भी कुछ ऐसा करें, जिसकी वजह से हमारे बुजुर्ग हम पर भी गर्व करें। इसीलिये हमें दो चीजों को नहीं भूलना चाहिए।
इस तरह से साध्वी श्री ने समझाने का प्रयास किया है कि हम भी हमारे जीवन में किन चीजों को अहमियत देते हैं और वास्तव में हमें किन चीजों को अहमियत देनी चाहिए। अगमज्ञाता साध्वी विश्व वंदना ने मनुष्य जीवन के मोक्ष जाने के 4 मार्ग बताए हैं, वे हैं दान, शील, तप एवं भावना। साध्वी श्री ने शील पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि हमारा शील, हमारा चारित्र्य पानी के जैसे निर्मल होना चाहिए। जो बिना दाग के आरपार दिख सके। शील कज व्याख्या करते हुए विश्व वंदना जी नर फरमाया कि माता मरुदेवी पूर्व भव में एक सेठानी के रूप में थीं। उन्होंने 60 हजार वर्ष तक अपने पति से दूर रहकर आयंबिल तक कि आराधना की और 60 हजार वर्ष तक शील का पालन किया। उन्होंने अपने चारित्र्य पर कभी भी किसी को लांक्षन लगाने का या कलंक लगाने का मौका ही नहीं दिया। 16 सतियों में सीता का वर्णन चलता है। सीता का अपहरण रावण किया था, उनके शील पर मोहित होकर उनका अपहरण किया था। परंतु सीता के शील में इतना प्रभाव था कि रावण उसको हाथ तक नहीं लगा सका। इस प्रकार से जैन आगम में शील का वर्णन हमें सुनने कोमिलता है। साध्वी विश्व वंदना जी ने कहा आज का युग कलयुग का युग है, इस युग में सीता,चंदनबाला, सती सुभद्रा आदि सतियों जैसी शील की रक्षा कक है, आज के इस युग में ऐसी सतियों का मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है, क्योंकि आज की हमारी ये पीढ़ी शील की रक्षा करने की बजाए शील का प्रदर्शन करने में छोटे-छोटे कपड़े पहनकर अपने अंगों का प्रदर्शन करती है, इसलिए आज भारतीय संस्कृति हमारी संस्कृति न रह करके पिछड़ी हुई संस्कृति में परिवर्तित होती जा रही है। हमें दूसरों को सुधारने से पहले स्वयं के चारित्र्य को, शील को सुधार लेना चाहिए जिससे हम हमारे शील की रक्षा कर सकें। इस तरह से अगमज्ञाता साध्वी विश्व वंदना जी ने शील के महत्व को बताते हुए हमारे जीवन में शील का कितना महत्च है, इस प्रकाश डाला ताकि हम हमारे सतीत्व की, शील की रक्षा कर सकें। हम माता मरुदेवी के जैसे तो नहीं बन सकते हैं, परंतु उनके जीवन से कुछ गुणों को लेकर हमारे जीवन में, हमारे चारित्र्य में हम परिवर्तन ला सकते हैं।
प्रवचन के पश्चात 4 प्रश्न पूछे जाते हैं और भाई बहनों को उसके लिए पुरस्कृत किया जाता है। मंच का संचालन अध्यक्ष मांगीलाल जी बोलिया ने किया। बाहर संघ से पधारे अतिथियों का सत्कार संघ कर मंत्री, कोषाध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं अन्य कार्यकारणी सदस्यों ने किया।
आज दो चीजें याद रखना मत, दो चीजें भूलना मत: विश्ववंदना जी म.सा.

