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आज भी नरेंद्र मोदी व भाजपा के लिए काम कर रहे हैं प्रशांत किशोर!

Last updated: October 31, 2019 8:39 pm
Surabhi Saloni
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6 Min Read
File Photo
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भाजपा के अलावा जिन पार्टियों के पास गए प्रशांत, उन्हें किया कमजोर
–निरंजन परिहार-
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद चुनावी रणनीतिकार  प्रशांत किशोर की  विश्वसनीयता पर शक के बादल गहराने लगे है।  राजनीतिक हलकों में  महाराष्ट्र के मामले में प्रशांत किशोर की राजनीतिक सूझबूझ, रणनीतिक  तैयारी  और ग्राउंड रियलिटी को समझने की क्षमता पर  प्रश्नचिन्ह उठने लगे हैं। इसके साथ सबसे बड़ा  सवाल यह भी पैदा हो रहा है कि  क्या वे दूसरी राजनीतिक पार्टियों को कमजोर करने के लिए  बीजेपी और नरेंद्र मोदी के रोल पर तो काम नहीं कर रहे हैं।  प्रशांत किशोर के प्रति प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी के रोल पर होने का यह सवाल  इसलिए पैदा हुआ है क्योंकि बिहार में जेडीयू, उत्तर प्रदेश और  गुजरात में कांग्रेस व अब  महाराष्ट्र में  शिवसेना को प्रशांत किशोर के चुनावी सहयोग ने ताकतवर करने के बजाय कमजोर किया है।
हाल ही में संपन्न महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में शिवसेना की पहले के मुकाबले कमजोर हुई हालत ने यह साबित कर दिया है कि प्रशांत किशोर को महाराष्ट्र की राजनीति समझ में ही नहीं आई।
महाराष्ट्र में  प्रशांत किशोर की  रणनीतिक तैयारियों के  फेल होने की असलियत पर उस वक्त मुहर लग गई, जब हाल ही में शिवसेना विधायकों ने  शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे से मिलकर प्रशांत की कमजोरियों को उनके सामने रखा। विधायकों ने ठाकरे से स्पष्ट कहा कि प्रशांत किशोर ना तो शिवसेना की राजनीति के असली रंग को पकड पाये,  न पार्टी की परंपरा को पकड़ पाए, न पार्टी कार्यकर्ताओं की ताकत का अंदाज लगा पाए और न ही महाराष्ट्र की राजनीतिक परिस्थितियों की गहनता को समझ पाए। इसलिए इस बार माहौल पक्ष में होने के बावजूद शिवसेना की सीटें पहले से कम कम हुई।
उल्लेखनीय है कि  प्रशांत किशोर की कंपनी आईपैक को शिवसेना ने आदित्य ठाकरे की छवि मजबूत बनाने, पार्टी की चुनावी रणनीति गढ़ने और स्थानीय स्तर पर उस रणनीति को लागू करने का काम सौंपा था।  जिसके बदले में प्रशांत किशोर ने करोड़ों रुपए फीस ली है। लेकिन उनकी रणनीति आदित्य ठाकरे की पदयात्रा के दौरान ही फीकी साबित होने लग गई। क्योंकि समानांतर चल रही मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की महाजनादेश यात्रा को अपार जन समर्थन मिलने लगा। फडणवीस की महाजनादेश यात्रा के मुकाबले आदित्य ठाकरे की चुनाव यात्रा को प्रदेश में उतना महत्व नहीं मिला, जिसकी शिवसेना को अपेक्षा थी।  शिवसेना में इसलिए भी प्रशांत किशोर और उनकी कंपनी आइपैक की महाराष्ट्र को समझने की क्षमता पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि प्रशांत ने शिवसेना से  कम से कम 75 विधायक जिताने का वादा किया था, यह  भी सुनने में आया है। लेकिन वे ऐसा नहीं कर पाए, शिवसेना को केवल 56 सीटों पर संतोष करना पड़ा। जबकि सन 2014 के चुनाव में शिवसेना 63 सीटों पर जीती थी।  इसीलिए खबर है कि प्रशांत किशोर को सौंपा गया आदित्य ठाकरे की रणनीति बनाने का काम यहीं खत्म किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि आदित्य ठाकरे खुद भी प्रशांत किशोर के कामकाज से कोई बहुत ज्यादा खुश नहीं है। इसके साथ ही  प्रशांत किशोर की व्यक्तिगत कार्यशैली, राजनीतिक व्यवहार और किसी की भी वाजिब बात न सुनने की आदत से शिवसेना के कई नेता ज्यादा नाराज है।  शिवसेना नेताओं का मानना है कि प्रशांत किशोर किसी की नहीं सुनते, जबकि उन्हें शिवसेना की अंदरूनी राजनीति, परंपरा और शिवसैनिकों की कार्यशैली के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है।  इसीलिए पार्टी को इस चुनाव में नुकसान पहुंचा है।
महाराष्ट्र में प्रशांत किशोर द्वारा  बनाई गई  चुनावी रणनीति के बावजूद शिवसेना को मिले जोरदार झटके के बाद प्रशांत किशोर को लेकर राजनीतिक हलकों में यह आशंका व्यक्त की जाने लगी है कि कहीं वे भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए बाकी दलों को कमजोर करने का काम तो नहीं कर रहे हैं। राजनीति के जानकार इस बात पर मुहर लगाते हुए प्रशांत किशोर द्वारा बिहार में नीतीश कुमार के लिए काम करने,  उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी की खाट खड़ी करवाने और गुजरात में कांग्रेस को सत्ता के नजदीक पहुंचने ना देने के इतिहास पर भी नजर डालने की राय देते हैं। चुनाव अभियान में सक्रिय भूमिका निभाने और बीजेपी व कांग्रेस के वॉर रूम चलाने वालों की माने तो प्रशांत किशोर की कार्यशैली पर इसलिए शंका उत्पन्न होती है क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी से उनकी नजदीकी आज भी वैसी की वैसी है जैसी 2014 में थी।  इससे यह माना जा रहा है कि कहीं प्रशांत किशोर मोदी के रोल पर काम करते हुए देश में दूसरे राजनीतिक दलों को कमजोर करने की में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
(प्राइम टाइम)

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