आज का विषय रहा – सोचो अगर माँ न होती
चैन्नई। माँ एक ऐसा शब्द है जिसके उच्चारण मात्र से शरीर , मन , आत्मा रोमांचित हो उठते हैं । एक अतुलनीय दिव्य आन्नद की जनित स्पन्दन की अनुभूति होती है । इस आन्नद की अनुभूति ही की जा सकती है शब्दों द्वारा व्याख्या नहीं हो सकती । जन्म लेने के साथ ही सबसे पहले हम मां को ही देखते हैं ।भूमिष्ठ होते ही सबसे पहले परिचय मां से ही होता है । मां की गोद में ही शिशु जीवन का पहला पाठ पढता है । मां की अंगुली थाम कर ही उसका विकास के पथ पर चलना शुरु होता है । मां सदा अपनी संतान को सहारा देती है। मां का पवित्र स्नेह प्रतिदान में कुछ नहीं चाहता । दु:ख शोक से जर्जरित मानव के लिए मां ही आशा की किरण होती है। उपरोक्त विचार आचार्य श्री महाश्रमण जी के विद्वान सुशिष्य मुनिश्री रमेश कुमार जी ने आज ट्रिप्लीकेन स्थित तेरापंथ भवन में आयोजित हुआ *परिवार सप्ताह* के अन्तर्गत *सोचो अगर मां न होती* विषय पर प्रवचन करते हुए व्यक्त किये । मां किस तरह से अपनी संतानों पर ममत्व के साथ लालन पोषण करती है इसे विस्तार से समझाते हुए वर्तमान युग में माता- पिता के साथ सम्मान जनक व्यवहार हो उनकी सेवा आदि में जागरुकता रख कर उनके बुढापे में सहारा बनना पुत्रों का कर्तव्य होता है।
अपने प्राग् वक्तव्य में मुनि सुबोध कुमार जी ने कहा- 21वीं शताब्दी में मानव बहुत आगे बढ़ना चाहता है । बढते हुए मानव के लिए कोई प्राणतत्व पोषक तत्व है तो वह है आहार । आहार के बिना उसके जीवन के बारे में भी नहीं सोचा जा सकता । आहार के बिना जीना मुश्किल है । तप कौन कर सकता है ? कैसे करना चाहिए ? तप से क्या क्या लाभ होते हैं ? इसे समझाते हुए मुनि सुबोध कुमार ने आगे कहा- तपस्या करुंगा तो मेरा समाज में स्वागत, सम्मान होगा इसके लिए तपस्या न करें । तपस्या केवल आत्मशुद्धि के लिए करें। न कि बाह्य पदार्थों की प्राप्ति के लिए तप न करें । कर्मों के बंधन से मुक्ति पाने के लिए तपस्या करें ।
तेरापंथ भवन ट्रिप्लीकेन चैन्नई में परिवार सप्ताह का शुभारंभ

