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ज्योतिचरण का स्पर्श पाकर ज्योतित हो उठा विजयनगर 

Last updated: July 6, 2019 10:13 pm
Surabhi Saloni
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5 Min Read
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-भव्य स्वागत जुलूस में दिखी सद्भावना की मिशाल
-वेदमंत्रों से श्री चन्द्रशेखर आजाद वेदिके में आचार्यश्री का हुआ स्वागत
-स्वानुशासन और परानुशासन का आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को दिया ज्ञान
-विजयनगरवासियों ने पूज्यचरणों में अर्पित की अपनी भावांजलि

06.07.2019 विजयनगर, बेंगलुरु (कर्नाटक): बेंगलुरु महानगर का मौसम हमेशा ठंडा ही रहता है। अक्सर यहां आसमान में बादल छाए दिखाई देते हैं। जरा-सा तापमान में वृद्धि नहीं होती है कि बादल बरस जाते हैं और वातावरण में शीतलता व्याप्त हो जाती है। ऐसे शीतल वातावरण तथा प्राद्यौगिकी क्षेत्र के अग्रणी महानगर में इस समय आध्यात्मिकता महामेघ, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के देदीप्यमान महासूर्य आचार्यश्री महाश्रमणजी की मुख से अविरल प्रवाहित होने वाली अमृतवाणी मेघ बनकर लोगों के मानस पर बरस भी रही है। यह बरसात लोगों को मानस में बढ़ रहे दुर्भावनाओं के तापमान को कम कर रही है और लोगों को मानसिक रूप से शीतल बना रही है। बेंगलुरु चतुर्मास से पूर्व पूरे महानगर को आध्यात्मिकता के मेघ से आच्छादित करने वाले आचार्यश्री श्रद्धालुओं की भावनाओं को पूर्ण करने के लिए क्षेत्र में पधार रहे हैं।
शनिवार को आचार्यश्री ने अपनी धवल सेना के साथ राजाजीनगर से प्रातः की मंगल बेला में प्रस्थान किया। रास्ते में अनेकानेक श्रद्धालुओं के घरों व व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के आसपास दर्शन देते, मंगलपाठ सुनाते आचार्यश्री गतिमान हुए। ऐसे में आचार्यश्री का आज विहार भी काफी प्रलम्ब हो गया। विजयनगर के श्रद्धालु अपने आराध्य की प्रतीक्षा में पलक पांवड़े बिछाए खड़े थे। आचार्यश्री जैसे ही विजयनगर की सीमा में पधारे पहले से साथ चल रहे श्रद्धालुओं और प्रतीक्षारत सैकड़ों श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री का आस्थासिक्त अभिनन्दन किया। इस जुलूस में सद्भावना की ज्योति दिखाई दे रही थी। क्या जैन और क्या अजैन सभी उत्साह के साथ महामानव के अभिनन्दन में जुटे हुए थे। भव्य जुलूस के साथ आचार्यश्री विजयनगर स्थित श्री चन्द्रशेखर आजाद वेदिके में पधारे। श्री मुरारीलाल दाधिच आदि पंडितों ने वेदमंत्रों के उच्चारण से आचार्यश्री को वर्धापित किया। आचार्यश्री के पदार्पण से पूर्व श्रद्धालुओं को साध्वीप्रमुखाजी ने प्रेरणा प्रदान की।
लगभग बारह बजे प्रवचन पंडाल में आचार्यश्री मंचासीन हुए। सर्वप्रथम विजयनगरवासियों को आचार्यश्री के श्रीमुख से सम्यक्त्व दीक्षा ग्रहण करने का सौभाग्य मिला। तत्पश्चात् आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि हमारे जीवन में अनुशासन का बहुत महत्त्व होता है। अनुशासन स्वयं से स्वयं पर भी किया जाता है और दूसरों पर भी अनुशासन करने की बात होती है। राज्य, राष्ट्र अथवा संगठन को चलाने के लिए अनुशासन करना होता है। आदमी को पहले स्वयं पर अनुशासन करने का प्रयास करना चाहिए। अपने शरीर, वाणी, मन और इन्द्रियों पर अनुशासन हो जाए तो स्वानुशासन की बात संभव हो सकती है। आदमी को अपने शरीर से अनावश्यक कार्य नहीं करना चाहिए। आदमी अपनी वाणी का संयम रखने का प्रयास करे। मन तो चारों ओर भटकने वाला होता है, उसे नियंत्रण में रखने का प्रयास हो और इन्द्रियों को नियंत्रण में रख लिया तो निज पर अनुशासन की बात हो सकती है और अपनी पूर्णरूप से स्वानुशासन को प्राप्त कर सकता है। स्वानुशासन रखने वाले का जीवन अच्छा हो सकता है। आदमी को स्वानुशासन और आत्मानुशासन की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। जो स्वयं पर अनुशासन कर सकता है उसे ही दूसरों पर अनुशासन करने का अधिकार होता है। भला अनुशासनहीन किसी दूसरे पर क्या अनुशासन चला सकता है? इसलिए आदमी को स्वानुशासन के द्वारा आदमी अपने परिवार, समाज व राष्ट्र का कल्याण करने वाला हो सकता है। जिस परिवार में अथवा राष्ट्र में अनुशासन नहीं होता, उसका नाश हो सकता है। आचार्यश्री ने विजयनगरवासियों को पावन आशीर्वाद प्रदान किया।
स्वागत के क्रम में विजयनगर-तेरापंथी सभा के अध्यक्ष श्री बंसीलाल पितलिया, मंत्री श्री कमल तातेड़, अभातेयुप के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री विमल कटारिया, स्थानीय काॅर्पोरेटर श्री आनंद होसूर, ज्ञानशाला प्रशिक्षिका व संयोजिका श्रीमती मधु कटारिया व अर्हम भवन के अध्यक्ष श्री प्रदीप जीरावला ने अपनी श्रद्धासिक्त अभिव्यक्ति देकर आचार्यश्री से आशीर्वाद प्राप्त किया। तेरापंथ महिला मण्डल, तेरापंथ युवक परिषद, तेरापंथ कन्या मण्डल ने अपने-अपने गीत के माध्यम से अपने आराध्य के श्रीचरणों में अपने श्रद्धा के सुमन चढ़ाए। ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति के द्वारा पूज्यश्री की अभ्यर्थना की। श्रीमती अनिशा बाबेल ने आचार्यश्री से 21 की तपस्या का प्रत्याख्यान किया।

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