– तमिलनाडु यात्रा के सम्पन्नता से पूर्व अहिंसा यात्रा पहुंची पेरनामबट
-तीन बाधक तत्त्वों से बचकर स्वाध्याय में रत रहने की आचार्यश्री ने दी पावन प्रेरणा
-फ्यूरेक संस्था ने आचार्यश्री के चरणों में समर्पित की अपनी मंगल भावना
पेरनामबट, वेलूर (तमिलनाडु): अपनी प्रथम दक्षिण भारत की यात्रा के दौरान तमिलनाडु की धरा को अपने ज्योतिचरण से पावन बना रहे महातपस्वी, शांतिदूत अखण्ड परिव्राजक के ज्योतिचरण का इंतजार दक्षिण भारत का कर्नाटक राज्य बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा है। हालांकि महातपस्वी की तमिलनाडु यात्रा भी अब सम्पन्नता की ओर है। महीनों तक तमिल की धरती पर भाषाई कठिनाइयों के बावजूद आचार्यश्री महाश्रमणजी ने लोगों को जो सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति का पाठ पढ़ाया है, उससे जन-जन मानस प्रभावित हुआ है और यह प्रभाव लोगों के जन मानस पर लम्बे समय तक अंकित रहेगा।
तमिलनाडु के संभवतः अंतिम दिन अर्थात् रविवार को आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी धवल सेना के साथ मोरसापल्ली से प्रातः की मंगल बेला में प्रस्थान किया। आचार्यश्री का जिस मार्ग पर विहार हो रहा था, प्रायः पूरा मार्ग इमली के वृक्षों से आच्छादित था। खट्टे का पर्याय मानी जाने वाली इमली आज शहद से मीठी मुस्कान और अमृतवाणी से जन-जन को सन्मार्ग दिखाने वाले महातपस्वी के स्वागत में मानों तोरण द्वार बनी खड़ी थी। शायद उन वृक्षों की ऐसी आशा जागृत हो रही होगी कि काश! आचार्यश्री के मीठे वचन हमें भी सुनने को प्राप्त हो जाते हैं। प्रायः पूरे विहार मार्ग को आच्छादित किए इमली के वृक्षों ने अहिंसा यात्रा के कारवें को छावं प्रदान कर मानों खुद को सौभाग्यशाली महसूस कर रहे थे। लगभग दस किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री महाश्रमणजी पेरनामबट में स्थित सेंट पाॅल‘स मैट्रिकुलेशन स्कूल परिसर में पधारे।
आज चतुर्दशी होने के कारण मंगल प्रवचन के दौरान आचार्यश्री के दोनों ओर गुरुकुलवासी साधु-साध्वियों की उपस्थिति थी। यह दृश्य सम्मुख उपस्थित श्रद्धालुओं को आह्लादित कर रही थी तो स्थानीय लोगों को आश्चर्यचकित कर रही थी। आचार्यश्री ने उपस्थित साधु-साध्वियों और समुपस्थित श्रद्धालुओं को पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि मानव जीवन में निषेध का भी अपना महत्त्व होता है। कोई कार्य, कोई वस्तु या पदार्थ जो निषेध किया जाता है, उससे जीवन पर विशेष प्रभाव पड़ता है। निषेध जीवन के स्तर को ऊंचा उठाने वाला हो सकता है। आचार्यश्री ने तीन निषेध-निद्रा को बहुमान न देना, जोर-जोर से संप्रहास का विवर्जन करना और विकथा अथवा मैथुनकथा आदि में रस न लेने उत्प्रेरित किया।
आचार्यश्री ने सदा स्वाध्याय में रत रहने की पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि निद्रा को बहुमान, संप्रहास करना और मैथुनकथा में रस लेना स्वाध्याय के बाधक तत्त्व हैं। इससे साधु-साध्वियों को ही नहीं आदमी को भी बचने का प्रयास करना चाहिए। स्वाध्याय से ज्ञान भी बढ़ता है और चरित्र की निर्मलता भी बढ़ती है। स्वाध्याय से बड़ा कोई तप नहीं होता। आचार्यश्री ने बाल साधु-साध्वियों के समय को स्वाध्याय का स्वर्णिम काल कर स्वाध्याय में रत होने की विशेष प्रेरणा प्रदान की। मंगल प्रवचन के पश्चात आचार्यश्री ने साधु-साध्वियों से प्रश्न पूछे और उन प्रश्नों के सटिक उत्तर भी स्वयं द्वारा प्रदान कर प्रेरित किया। तत्पश्चात हाजरी का क्रम रहा। आचार्यश्री की तमिलनाडु यात्रा की सम्पन्नता के संदर्भ में ‘फ्यूरेक’ नामक संस्था द्वारा मंगलभावना का कार्यक्रम किया गया। इसमें आॅडियो-वीडियो के माध्यम से आचार्यश्री के जीवनवृत्त को प्रदर्शित किया गया। फ्यूरेक के संयोजक श्री गौतम सेठिया वीडीएस और अध्यक्ष श्री अब्दुल समद ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने फ्यूरेक को पावन आशीष प्रदान की।

