लाडनूं । पर्वाधिराज पर्युषण का तीसरा दिवस सामायिक दिवस के रूप में समायोजित। जैन विश्व भारती के सुरम्य परिसर में विराजमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, शांतिदूत, युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस पर्वाधिराज का पूर्ण आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने के लिए अपने सुगुरु की सन्निधि में पहुंचे हुए हैं। प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व से ही धर्माराधना का जो विशेष क्रम प्रारम्भ हो रहा है, वह देर रात तक निरंतर गतिमान है।
गुरुवार को पर्वाधिराज पर्युषण का तीसरा दिवस सामायिक दिवस के रूप में आयोजित हुआ। मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में श्रद्धालु, साधु-साध्वियों, समणियों व मुमुक्षुवृंद की विराट उपस्थिति थी। युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी, युवाचार्यश्री के साथ मंचासीन हुए और नमस्कार महामंत्र के साथ आज के कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। सामायिक दिवस पर साध्वी मुकुलयशाजी आदि साध्वीवृंद ने गीत का संगान किया।
आत्म कर्तृत्ववाद पर साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने जनता को संबोधित किया। साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने उपस्थित जनमेदिनी को सामायिक दिवस के संदर्भ में मार्गदर्शन प्रदान किया। युवाचार्यश्री महावीरकुमारजी ने दस धर्मों के अंतर्गत लाघव धर्म को व्याख्यायित किया।
युगप्रधान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपने पावन प्रवचन में ‘भगवान महावीर की अध्यात्म की यात्रा’ के अंतर्गत मरिचि के भव क्रम को आगे बढ़ाते हुए कहा कि मरिचि जब साधु परंपरा से अलग होकर अपने ढंग से साधना करने लगा तो वह एक बार बीमार हो गया। शरीर को व्याधि का मंदिर कहा गया है। इस शरीर में कभी भी कोई भी बीमारी हो सकती है। कम उम्र में भी कोई गंभीर बीमारी लग जाए। यह भी भाग्य की बात कोई बीमार ही न हो। बीमार होने पर कोई सेवा करने वाला और चित्त समाधि देने वाला मिल जाए तो बहुत विशेष बात हो सकती है। मरिचि बाद में स्वस्थ भी हो गए।
मरिचि इस जीवन को सम्पन्न कर पांचवें देवलोक में उपपन्न होता है। पुनः वहां का आयुष्य सम्पन्न कर पांचवें भव में कौशिक नाम का ब्राह्मण बनता है। जीवन के सन्ध्याकाल में वह त्रिदण्डी संन्यासी बनकर जीवन को साधना में लगाता है। इस पांचवें भव के बाद भगवान महावीर की आत्मा अनेक भवों को पार करते हुए छठे भव पुष्यमित्र नामक ब्राह्मण बनते हैं। वहां भी जीवन बीताने के बाद अंतिम समय में परिव्राजक बन जाते हैं। नवमें भव में ईशान देवलोक मंे पहुंचते हैं। दसवें भव में पुनः अग्निभूति ब्राह्मण बनते हैं। ग्यारहवें भव में तीसरे देवलोक में उत्पन्न होते हैं। बारहवें भव में पुनः भारद्वाज नामक ब्राह्मण बनते हैं। तेरहवें भव में चौथे देवलोक में उत्पन्न होते हैं। चौदहवें भव में ब्राह्मण बनते हैं, जिसका नाम स्थावर था और फिर अंत में परिव्राजक बन जाते हैं। अपने पन्द्रहवें भव में पंचम देवलोक में पधारते हैं। सोलहवें भव में राज परिवार में जन्म होता है। चारित्र भी ग्रहण करते हैं तो निदान भी कर लेते हैं। निदान करने का मतलब हो गया अपनी तपस्या-साधना को बेच देना।
भौतिक सुखों के लिए अध्यात्म की साधना को दांव पर लगा देना, अच्छी बात नहीं मानी जाती। भगवान महावीर की आत्मा अपने सत्रहवें भव में सातवें देवलोक में पहुंचती है। वहां से पुनः पोतनपुर के राजा प्रजापति के घर में जन्म लेते हैं। अपने दोनों राजकुमारों को विद्या अध्ययन के लिए भेजते हैं। उस समय का प्रति वासुदेव था अश्वग्रीव, जिसकी राजधानी रत्नपुर थी।
आचार्यश्री ने सामायिक दिवस के संदर्भ में पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि सामायिक साधना जीवन में हो तो बहुत अच्छी बात हो सकती है। श्रावकों के लिए सामायिक तो एक मुहूर्त की ओती है। 48 मिनट की सामायिक का अर्थ है कि एक दिन प्राप्त चौबीस घंटों में से दो-दो मिनट के बाराबर समय निकालना। हमनें शनिवार की सायं सात से आठ बजे के बीच सामायिक का बता रखा है।
बाकी सुबह-सुबह की सामायिक आदि हो जाए तो कि कितनी अच्छी बात हो सकती है। कोई यह नियम रखे कि बिना समायिक किए नाश्ता ही नहीं करना तो वह भी बहुत अच्छी बात हो सकती है। थोड़ी उम्र हो जाए तो प्रतिदिन एक-दो सामायिक हो जाए। सामायिक श्रावक जीवन का अच्छा अनुष्ठान है। सामायिक मानों जीवन का आध्यात्मिक आभूषण है। श्रावक को यह आभूषण पहनने का प्रयास करना चाहिए। श्रावक भी जब चद्दर ओढ़कर और मुखवस्त्रिका लगा लेता है तो कुछ अंशों में साधु की भांति बन जाता है। गृहस्थ जीवन में सामायिक की साधना चलती रहे। आचार्यश्री तुलसी तो सामायिक का अभिनव प्रयोग कराया करते थे। सभी श्रावक-श्राविकाओं को सामायिक का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री ने चतुर्दशी के संदर्भ में हाजरी के क्रम को संपादित करते हुए चारित्रात्माओं को विविध प्रेरणाएं प्रदान की। उपस्थित चारित्रात्माओं ने अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र उच्चरित किया। पर्युषण पर्वाधिराज का अगला दिन वाणी संयम दिवस के रूप में समायोजित होगा।
जीवन का आध्यात्मिक आभूषण है सामायिक : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
Highlights
- सामायिक दिवस के रूप में समायोजित हुआ पर्वाधिराज पर्युषण का तीसरा दिवस
- आचार्यश्री ने ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ के वर्णन क्रम को पहुंचाया अठारहवें भव में
- लाघव धर्म को युवाचार्यश्री ने किया विश्लेषित
- सामायिक दिवस के महत्त्व को साध्वीप्रमुखाजी ने किया व्याख्यायित
- आत्म कर्तृत्ववाद को साध्वीवर्याजी ने किया वर्णित

