लाडनूं । जन-जन की आत्मा को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने रविवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित जनता को आज के निर्धारित विषय ‘सामायिक से क्या मिलेगा?’ को व्याख्यायित करते हुए कहा कि सामायिक शब्द जैन साधना पद्धति में प्रसिद्ध है।
गृहस्थ सामायिक करते हैं। साधु द्वारा सामायिक चारित्र ग्रहण किया जाता है। सामायिक के तीन प्रकार हो जाते हैं- सम्यक्त्व सामायिक, श्रुत सामायिक और चारित्र सामायिक। चारित्र सामायिक के भी दो प्रकार हो जाते हैं- देश विरति सामायिक और सर्वविरिति सामायिक।
तत्त्व श्रद्धा रूप सम्यक्त्व सामायिक होती है, तत्त्व परिज्ञान रूप श्रुत सामायिक होती है तथा श्रद्धा व ज्ञान के अनुरूप विरमण करना चारित्र सामायिक हो जाती है। गृहस्थ है, श्रावक है तो उसे देश विरति सामायिक और साधु है तो उसे सर्वविरति सामायिक हो जाती है।
प्रश्न किया गया कि सामायिक क्या प्राप्त होता है? उत्तर दिया गया कि सामायिक से सावद्य योग विरति को जीव प्राप्त करता है। एक साधु जो चारित्र ग्रहण करता है, वह सर्व सावद्य योग का तीन करण तीन योग से प्रत्याख्यान कर लेता है। सामायिक चारित्र है। इसमें सर्व सावद्य योग विरति होती है। साधु के लिए यह सर्व सावद्य योग विरति जीवन भर के लिए होती है और तीन करण तीन योग से होती है।
यह जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि है। सावद्य योग से विरति सामायिक से हो जाती है। पाप सहित मन, वचन और काय की जो भी प्रवृत्ति है, करना, कराना और अनुमोदना तीनों रूपों से छोड़ी जाती है। सामायिक का सबसे बड़ा लाभ है सावद्य योग से विरत हो जाना। साधु का जीवन भर के लिए सावद्य योग से विरत रहने का संकल्प होता है। छदमस्थता की स्थिति में प्रमाद की स्थिति भी बन सकती है।
जीवन में कोई लब्धि भी हो जाए तो उसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। कोई दोष लग जाए तो उससे शुद्धि करने के लिए प्रतिक्रमण व प्रायश्चित्त की आवश्यकता होती है। यह साधु के जीवन को सुरक्षित रखने के दो उपाय हैं। साधु को अपनी शक्ति का उपयोग किसी को ज्ञान देने में, प्रवचन देने में, किसी को संयमी बनाने में करना चाहिए।
गुस्से में आकर जोर-जोर से बोलने से बचने का प्रयास होना चाहिए। बोलने की शक्ति होने पर भी मौन कर लेना बहुत बड़ी साधना की बात हो सकती है। तार्किक शक्ति का उपयोग सिद्धांत आदि की बातों को बताने में किया जा सकता है। शक्ति होने पर भी क्षमा कर देना बहुत बड़ी बात होती है। यह बहुत अच्छी साधना की बात हो सकती है। गुणों से ही गुरु बड़ा होता है, क्रोध को भी सहन कर जाना गुरु की गुरुता होती है। जो मुखिया होते हैं, अनुशास्ता होते हैं, उनके सामने अनेक प्रकार की स्थितियां आ सकती हैं। सहन करने की शक्ति अनुशास्ता में भी रहे, ऐसा प्रयास होना चाहिए।
श्रावक की सामायिक देश विरति सामायिक होती है और वह एक मुहूर्त के लिए होती है। उसमें भी सावद्य योग से विरति होती है। साधु-साध्वी और श्रावक-श्राविका- ये चारों तीर्थ ही रत्नों की माला हैं। सामायिक लेने से सावद्य योग से विरति हो जाती है। इससे शुभ योग का प्रवर्तन भी हो सकता है। प्रवचन श्रवण से आध्यात्मिक ज्ञान के साथ-साथ कई बार अपनी जिज्ञासाओं के उत्तर भी मिल सकते हैं। ध्यान से सुनने से कोई अच्छा प्रवचन करने वाला भी बन सकता है। ध्यान से सुनने वाला कभी वक्ता भी हो सकता है। इस प्रकार सामायिक से अनेक प्रकार के लाभों की प्राप्ति हो सकती है। आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं की जिज्ञासाओं के उत्तर भी प्रदान किए। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्यश्री कहा कि महासभा के तत्त्वावधान में तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन का तीसरा और अंतिम दिन है। यह अच्छा सम्मेलन है।
महासभा के कार्यकर्ता व पदाधिकारीगण सभी खूब अच्छा धार्मिक-आध्यात्मिक सेवा करते रहें। सभाओं से आए हुए प्रतिनिधि भी अपने-अपने क्षेत्रों में अपनी जागरणा रखें। क्षेत्रों में विराजमान साधु-साध्वियों की सेवा होती रहे, सभी में खूब अच्छी जागरणा बनी रहे। आचार्यश्री की अनुज्ञा से मंगलपाठ के उपरान्त तेरापंथी सभा प्रतिनिधि सम्मेलन में संभागी प्रतिनिधियों को साध्वीवर्याजी और साध्वीप्रमुखाजी से भी मंगल प्रेरणा प्राप्त हुई। इस कार्यक्रम का संचालन महासभा के महामंत्री श्री विनोद बैद ने किया।

