बेंगलुरु। श्री श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन श्रावक संघ ट्रस्ट एवं चातुर्मास समिति, हलसुरु के तत्वावधान में सुब्रह्मण्यम स्वामी कल्याण मंडप में आयोजित धर्मसभा में आचार्य श्री पार्श्वचन्द्रजी म.सा. के सान्निध्य में पूज्य गुरुदेव डॉ. श्री पदमचन्द्रजी म.सा. ने कर्म सिद्धांत, समता, धैर्य, शील, संस्कार एवं पारिवारिक जीवन पर प्रेरणादायी प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि जीवन में आने वाले सुख-दुःख किसी व्यक्ति विशेष के कारण नहीं, बल्कि अपने ही कर्मों के उदय का परिणाम हैं। इसलिए विपरीत परिस्थितियों में किसी को दोष देने के बजाय समता और धैर्य रखना चाहिए।
गुरुदेव ने कहा, “रात के बाद दिन आना निश्चित है। उसी प्रकार दुःख के बाद सुख भी आता है। इसलिए दुःख के समय धर्म का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।” मनुष्य को सुख में अहंकार और दुःख में निराशा से बचना चाहिए। ज्ञानी व्यक्ति सुख-दुःख में समता रखता है। कर्मबंध की प्रक्रिया समझाते हुए उन्होंने कहा कि जब आत्मा समभाव में रहती है और अपने स्वभाव में रमण करती है, तब नए कर्मों का बंध नहीं होता। लेकिन मन, वचन और काया के योग जब राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कषायों से जुड़ते हैं, तब आत्मा में स्पंदन पैदा होता है और कर्म पुद्गल आत्मा से जुड़कर कर्मबंध का कारण बनते हैं। जैसे शांत सरोवर में पत्थर पड़ते ही लहरें उठती हैं और मिट्टी पानी को मटमैला कर देती है, वैसे ही विकारी भाव आत्मा की शांति भंग कर देते हैं।
माता-पिता के महत्व पर गुरुदेव ने कहा कि मां बच्चे की पहली गुरु है। माता-पिता अपने बच्चों के पालन-पोषण में जीवन लगा देते हैं, इसलिए संतान को उनके त्याग और उपकार को कभी नहीं भूलना चाहिए। उन्होंने कहा कि परिवार छोटा होने से नहीं, बल्कि प्रेम, संस्कार, सहनशीलता और सम्मान से सुखी बनता है। सास-बहू, ननद-भाभी और भाई-बहन के रिश्तों में अहंकार के बजाय अपनापन और समझदारी होनी चाहिए।
शीलमंजरी के आख्यान के माध्यम से उन्होंने शील और संस्कार की महत्ता बताई। उन्होंने कहा कि बचपन में मिले संस्कारों ने शीलमंजरी को कठिन परिस्थितियों में भी अपने शील और मर्यादा पर दृढ़ रखा। षड्यंत्र के कारण उस पर झूठा आरोप लगा और बिना सत्य जाने उसे घर से निकाल दिया गया। इस प्रसंग से उन्होंने कहा कि “आंखों देखा और कानों सुना भी हमेशा पूरा सत्य नहीं होता।” किसी के चरित्र पर बिना सत्य जाने आरोप नहीं लगाना चाहिए और क्रोध या आवेश में निर्णय लेने से बचना चाहिए। कर्म सिद्धांत पर उन्होंने कहा, “कर्म किसी को नहीं छोड़ते। हमने जैसा कर्म किया है, उसका फल हमें भुगतना ही पड़ता है।” इसलिए विपरीत समय में परिवार के किसी सदस्य को दोष देने के बजाय अपने कर्मों को समझना चाहिए। उन्होंने गुरु-सान्निध्य का महत्व बताते हुए कहा कि गुरु से सांसारिक वस्तुओं की मांग करने के बजाय पाप कर्मों को समता से सहन करने, उनकी निर्जरा करने और धर्ममार्ग पर दृढ़ रहने की शक्ति मांगनी चाहिए।
गुरुदेव ने कहा कि धन जीवन की वास्तविक पूंजी नहीं है। धर्म, संस्कार, शुभ भाव और अच्छे कर्म ही मनुष्य की सच्ची पूंजी हैं। सेवा की शुरुआत घर से करनी चाहिए। माता-पिता, परिवार और जरूरतमंदों की निस्वार्थ सेवा तथा धर्मस्थान पर सेवाभाव से कार्य करना आत्मकल्याण का सहज मार्ग है। उन्होंने कहा कि आज विज्ञान और तकनीक ने सुविधाएं बढ़ाई हैं, लेकिन मनुष्य को मशीनों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर पूरी तरह निर्भर होने के बजाय अपने विवेक, स्मरणशक्ति और चिंतन का उपयोग करना चाहिए। भगवान महावीर की यतना और संयम की शिक्षा को जीवन में अपनाना चाहिए। गुरुदेव ने आह्वान किया कि माता-पिता का सम्मान, परिवार में प्रेम, शील-संस्कार की रक्षा, सेवा, गुरु-सान्निध्य और सुख-दुःख में समता को जीवन का आधार बनाएं। यही आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की दिशा में सच्चा प्रयास है। धर्मसभा में चैन्नई सहित बेंगलुरु के विभिन्न उपनगरों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे। राजकुंवर लोढ़ा एवं पूजा नाहर ने 14 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। मध्यान्ह श्री जयमल जैन संस्कार शिविर में 125 बालक-बालिकाओं ने भाग लिया। शिविर में जे.पी.पी. जैन महिला फाउण्डेशन, हलसुरु महिला मण्डल एवं नवकार बहु मण्डल की सदस्याओं ने सेवाँए प्रदान की। श्री जैन युवक संघ, अलसूर के सदस्यों ने एकान्तर कर रहे 75 तपस्वियों के सामूहिक पारणे में पुरस्कारी सेवाँए प्रदान की।
सुख-दुःख कर्मों का खेल, समता रखना ही सच्ची साधना : डॉ. श्री पदमचन्द्रजी म.सा.

