बेंगलुरु । श्री श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन श्रावक संघ ट्रस्ट एवं चातुर्मास समिति, हलसुरु के तत्वावधान में सुब्रह्मण्यम स्वामी कल्याण मंडप में आयोजित धर्मसभा में आचार्य पार्श्वचंद्र आदि ठाणा-7 के सान्निध्य में पूज्य गुरुदेव डॉ. श्री पदमचंद्रजी म.सा., श्री जयधुरंधरमुनिजी म.सा. एवं श्री जयपुरंदरमुनिजी म.सा. ने सम्यक्त्व, ईर्ष्या, कर्म सिद्धांत और जीव के स्वरूप पर मार्गदर्शन दिया।
मोह और मिथ्यात्व का त्याग कर तप-साधना से आत्मकल्याण की ओर बढ़ें : डॉ. श्री पदमचन्द्रजी म.सा.
पूज्य गुरुदेव डॉ. श्री पदमचन्द्रजी म.सा. ने आचार्य सम्राट पूज्य श्री जयमलजी महाराज साहब की काव्य रचना ‘जीवा बयांलिसी’ के संदर्भ में जीव की संसार यात्रा, दुर्लभ मनुष्य भव, सम्यक्त्व, तपस्या और आत्मकल्याण पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जीव अनादिकाल से एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक विभिन्न योनियों में भटकता हुआ अत्यंत दुर्लभता से मनुष्य भव प्राप्त करता है। मनुष्य जीवन मिलने के बाद भी मोह और मिथ्यात्व के कारण जीव पुनः संसार के चक्र में भटक सकता है। उन्होंने कहा कि सम्यक्त्व प्राप्त होने के बाद भी आत्मा की यात्रा समाप्त नहीं होती, बल्कि वास्तविक साधना का मार्ग प्रारंभ होता है। भगवान महावीर और भगवान आदिनाथ के जीवन प्रसंगों से स्पष्ट होता है कि सम्यक्त्व के पश्चात भी दीर्घ साधना और पुरुषार्थ के माध्यम से मोक्षमार्ग की सिद्धि होती है। इसलिए मनुष्य भव को केवल सांसारिक सुख-सुविधाओं में नहीं, बल्कि आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग में लगाना चाहिए। डॉ. श्री पदमचन्द्रजी म.सा. ने कहा कि तपस्या का उद्देश्य केवल शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि भीतर जमे राग-द्वेष और मोह को कम करना तथा कर्मों की निर्जरा करना है। संवर और तप के माध्यम से कर्मों के बंधन को कमजोर किया जा सकता है।
उन्होंने तपस्या के महत्व को समझाते हुए कहा कि जब साधक दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास के साथ तप करता है, तो शरीर अपनी उपलब्ध ऊर्जा का उपयोग करने की प्राकृतिक प्रक्रिया अपनाता है।
पूज्य गुरुदेव ने कहा कि तप और साधना की सफलता में आस्था, गुरु-भक्ति और समर्पण का विशेष महत्व है। उन्होंने कहा, “शक्ति अपनी नहीं, शक्ति तो गुरुदेव और प्रभु की है, भक्त की तो केवल भक्ति और समर्पण है।” जब साधक अपने अहंकार और इच्छाओं को छोड़कर गुरु एवं प्रभु के प्रति पूर्ण श्रद्धा रखता है, तो कठिन साधना भी सहज बन जाती है।
ईर्ष्या सुख और विवेक के विनाश का कारण : जयधुरंधरमुनिजी म.सा.
श्री जयधुरंधरमुनिजी म.सा. ने कहा कि ईर्ष्या मनुष्य के सुख, सद्भाव और विवेक को नष्ट कर देती है। दूसरों की प्रगति देखकर ईर्ष्या करने के बजाय उनसे प्रेरणा लेकर स्वस्थ स्पर्धा करनी चाहिए। अपनी लकीर बड़ी करने के लिए दूसरे की लकीर छोटी नहीं, बल्कि अपने पुरुषार्थ से अपनी लकीर बड़ी करनी चाहिए। ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों के गुणों के बजाय अवगुण देखता है, इसलिए साधक को गुणग्राही बनना चाहिए।
मुनिश्री ने वणिक पुत्र और ब्राह्मण पुत्र के दृष्टांत से समझाया कि ईर्ष्या व्यक्ति का विवेक हर लेती है और वह दूसरों का अहित करने के प्रयास में स्वयं का नुकसान कर बैठता है। शकुन-अपशकुन के भ्रम से बचने की प्रेरणा देते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में सुख-दुःख और सफलता-असफलता के पीछे कर्मों का सिद्धांत है। ईर्ष्या को दूर रखकर दूसरों की उन्नति में प्रसन्नता और अपने पुरुषार्थ पर विश्वास रखना चाहिए।
कर्मों के अनुसार जीव की विविधता : जयपुरंदरमुनिजी म.सा.
श्री जयपुरंदरमुनिजी म.सा.आचार्य श्री जयमलजी म.सा. द्वारा रचित ‘जीवा बयांलिसी’ काव्य पर प्रवचन देते हुए ने कहा कि संसार में जीवों के रूप, शरीर, बुद्धि, सुख-दुःख और परिस्थितियों में जो भिन्नता दिखाई देती है, उसका मूल कारण कर्म है। आचारांग सूत्र के ‘कम्मुना उवाही जणमई’ सूत्र का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जीव जैसा कर्म रूपी बीज बोता है, उसी के अनुरूप फल प्राप्त करता है। आत्मा मूल रूप से शुद्ध है, लेकिन कर्मों के आवरण के कारण जीवों में विविधता दिखाई देती है। उन्होंने छह कायिक जीवों-पृथ्वीकाय, अप्काय, तेजस्काय, वायुकाय, वनस्पतिकाय एवं त्रसकाय-में जीव की सत्ता समझाते हुए कहा कि स्थावर जीव अपनी पीड़ा व्यक्त नहीं कर पाते, लेकिन उनमें भी चेतना और वेदना होती है। भगवान महावीर ने सूक्ष्म जीवों की सत्ता को जानकर अहिंसा एवं अनुकंपा का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि परिस्थितियों को दोष देने के बजाय अपने कर्मों और पुरुषार्थ को सुधारना ही आत्मकल्याण का मार्ग है। श्रीमति सरोज फुलबगर ने 12 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए श्री मति वनिता कोठारी एवं श्रीमति उषा कांकरिया के 11 उपवास की पूर्णाहति पर तपस्या की बोली द्वारा तपस्वी का बहुमान किया गया| 16 सती साधना जप-तप के साथ गतिमान है| रविवार को प्रात: 9:15 से 11:00 बजे तक डॉ. श्री पदमचन्द्रजी म.सा. द्वारा “सती शीलमंजरी” पर विशेष प्रवचन होगा| मध्यान्ह 1 बजे से 4 बजे तक जयमल जैन संस्कार शिविर का आयोजन किया गया है| अध्यक्ष किशनलाल कोठारी ने स्वागत किया, मंत्री चन्द्रप्रकाश मुथा ने संचालन किया और कार्याध्यक्ष सुनील गादिया ने जानकारी दी| धर्मसभा मे चेन्नई, सिकन्दराबाद, रायचूर, कोयम्बतूर आदि क्षेत्रों से एवं बेंगलुरु के उपनगरो से बड़ी संख्या में श्रद्धालू उपस्थित थे।
सम्यक्त्व की दृढ़ता, ईर्ष्या का त्याग और कर्मों की समझ आत्मकल्याण का मार्ग

