पाली। मारवाड़ की मिट्टी में कुछ ऐसे लोग जन्म लेते हैं जिनका जीवन किसी पद या पहचान से बड़ा हो जाता है। सेठ दीपचंद सोलंकी भी ऐसे ही व्यक्तित्व थे, जिन्हें याद करना दरअसल एक पूरे दौर को याद करना है। पचास वर्षों से भी अधिक समय तक उन्होंने ग्राम पंचायत की सेवा में स्वयं को समर्पित रखा—कभी वार्ड पंच के रूप में, कभी उप सरपंच के रूप में और कभी सरपंच के रूप में। पंचायत समिति में भी उन्होंने एक लंबी सक्रिय भूमिका निभाई। यह केवल पदों की सूची नहीं थी, बल्कि एक ऐसे जीवन की कहानी थी जो पूरी तरह समाज के लिए जिया गया।
मारवाड़ के गांवों में आज भी बुजुर्ग जब पुराने दिनों की बात करते हैं तो सेठ दीपचंद सोलंकी का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। ग्रामीण बताते हैं कि वह ऐसे जनप्रतिनिधि थे जिनके दरवाज़े आम आदमी के लिए हमेशा खुले रहते थे। किसी के खेत का विवाद हो, किसी गरीब की मदद का सवाल हो, या गांव के विकास का मुद्दा—वे हर काम को अपना कर्तव्य मानते थे। उस समय संसाधन सीमित थे, व्यवस्थाएँ सरल थी, लेकिन नीयत साफ़ थी। शायद इसी कारण लोग उन्हें केवल नेता नहीं बल्कि अपना मार्गदर्शक मानते थे।
उनका जीवन इस बात का उदाहरण था कि राजनीति केवल सत्ता पाने का माध्यम नहीं बल्कि सेवा का मार्ग भी हो सकती है। उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं जोड़ा, लेकिन गांवों के लिए बहुत कुछ किया। अस्पताल, विद्यालय, सड़कों, तालाब-पानी, सामुदायिक कार्यों और सामाजिक एकता के प्रयासों में उनका योगदान लोगों को आज भी याद है। कई ग्रामीण कहते हैं कि उन्होंने गांवों को केवल प्रशासनिक रूप से नहीं बल्कि भावनात्मक रूप से भी जोड़ा। लोगों के बीच बैठकर समस्याएँ सुनना और समाधान निकालना उनकी शैली थी।
17 अगस्त 1983 का दिन मारवाड़ के लिए एक ऐसा दिन बना जब यह सादा और सेवाभावी व्यक्तित्व संसार से विदा हो गया। उस समय उनकी आयु केवल 65 वर्ष थी, लेकिन जीवन की उपलब्धियाँ कई पीढ़ियों से बड़ी थी।उनके जाने के बाद लोगों को पहली बार यह महसूस हुआ कि सच्चे जनसेवक की कमी क्या होती है। आज भी कई ग्रामीण कहते हैं कि उनकी कमी अब तक कोई पूरी नहीं कर पाया।
समय बदल गया है, व्यवस्थाएँ बदल गई हैं, लेकिन कुछ नाम इतिहास की तरह समाज की स्मृति में दर्ज हो जाते हैं। सेठ दीपचंद सोलंकी उन्हीं नामों में से एक हैं। वे आज हमारे बीच भले ही शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, लेकिन उनके काम, उनकी सोच और समाज के लिए किया गया समर्पण आज भी लोगों को प्रेरित करता है। यही कारण है कि मारवाड़ के गांवों में उनकी याद केवल स्मृति नहीं बल्कि एक प्रेरणा बनकर जीवित है।
“आधी सदी की जनसेवा: मारवाड़ के जननायक सेठ दीपचंद सोलंकी”

