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विद्याभूमि राणावास में महातपस्वी महाश्रमण का मंगल पदार्पण

Last updated: December 12, 2025 12:21 am
Surabhi Saloni
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7 Min Read
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Highlights
  • भव्य स्वागत जुलूस में उमड़े श्रद्धालु व ग्राम्यजन, प्राप्त किया आशीर्वाद
  • श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी मानवहितकारी संघ विद्याभूमि में हुआ पावन प्रवास
  • पांच बाधाओं को दूर कर ज्ञान प्राप्ति का हो सार्थक प्रयास : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
  • श्रद्धालुओं तथा विद्यार्थियों ने मानवता के मसीहा की अभिवंदना दी प्रस्तुति

राणावास, पाली (राजस्थान)। मारवाड़ की धरा पर आध्यात्म की गंगा प्रवाहित करते हुए निरंतर गतिमान जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी गुरुवार को गुड़ा रामसिंह से राणावास की ओर प्रस्थित हुए तो गुड़ा रामसिंह के श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य के श्रीचरणों में अपनी प्रणति अर्पित करते हुए कृतज्ञ भाव व्यक्त किए। लोगों को आशीष प्रदान करते हुए आचार्यश्री अगले गंतव्य की ओर बढ़ चले। भारत का उत्तरी और मध्य हिस्सा वर्तमान में सर्दी के मौसम से सिकुड़ा हुआ है। राजस्थान के इस क्षेत्र में भी सर्दी का असर दिखाई दे रहा है। हालांकि दिन चढ़ने के साथ ही सूर्य किरणें सर्दी पर हावी हो जा रही हैं।
आचार्यश्री का आज का विहार राणावास की ओर हो रहा था। मार्ग में अनेक गांव के ग्रामीणों को आचार्यश्री के दर्शन करने का अवसर मिला। शांतिदूत आचार्यश्री दर्शनार्थियों को मंगल आशीर्वाद प्रदान करते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। राणावास के श्रद्धालु अपने आराध्य की अभिवंदना में उत्साहित नजर आ रहे थे। पूरा गांव मानों महाश्रमणमय बना हुआ था। शांतिदूत आचार्यश्री हाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ लगभग नौ किलोमीटर का विहार परिसम्पन्न कर राणावास गांव के निकट पधारे तो मानवता के मसीहा की अगवानी से जुटे सैंकड़ों श्रद्धालुओं ने आचार्यश्री का वभीना अभिनंदन किया। भव्य स्वागत जुलूस के साथ युगप्रधान आचार्यश्री राणावास की ग्रामीण जनता पर मंगल आशीष की वृष्टि करते हुए राणावास में स्थित श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी मानव हितकारी संघ, विद्याभूमि परिसर में पधारे। विद्यालय के छात्र-छात्राओं व संबंधित पदाधिकारियों, शिक्षकों आदि ने आचार्यश्री का भक्तिपूर्ण स्वागत किया।
विद्याभूमि परिसर में बने विशाल प्रवचन पण्डाल में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित जनता, विद्यार्थियों आदि को महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगल संबोध प्रदान करते हुए कहा कि आदमी के जीवन में ज्ञान का बहुत महत्त्व है। ज्ञान एक पवित्र तत्त्व है। ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रयास भी किया जाता है। दुनिया में कितने-कितने शिक्षा संस्थान संचालित होते हैं। शिक्षा प्राप्ति के लिए आदमी को बाधाओं से बचने का प्रयास करना चाहिए। आगम में शिक्षा प्राप्ति में पांच प्रकार की बाधाएं बताई गई हैं। उनमें पहला है-अहंकार। जिसके जीवन में अहंकार का भाव आ जाता है, वह विद्या का अर्जन नहीं कर सकता। गुरु पूजनीय हैं, वंदनीय हैं, वहां जब तक झुकेगा नहीं तो वह भला ज्ञान कैसे प्राप्त कर सकता है। जो विनयशील होता है, वह विद्या का अर्जन कर सकता है। इसलिए ज्ञान प्राप्त करने के लिए आदमी के भीतर विनय व विनम्रता का भाव होना चाहिए। दूसरी बाधा है-क्रोध। गुस्सा करना भी विद्या प्राप्ति में बाधक बनता है।
जिस विद्यार्थी में ज्यादा गुस्सा करता है, उसे विद्या की प्राप्ति संभवतः नहीं हो सकती। तीसरी बाधा बताई गई है-प्रमाद। जो विद्यार्थी प्रमाद में चला जाए, नशे आदि का सेवन करने लगे, भला वह ज्ञान का अर्जन कैसे कर सकता है। विभिन्न आमोद-प्रमोद के विषय में रुचि लेने लग जाए तो उसके ज्ञान में बाधा आ जाती है। इसलिए विद्यार्थी को प्रमाद से भी बचने का प्रयास करना चाहिए। विद्या प्राप्ति में चौथी बाधा बताई गई है- रोग। अगर कोई रोग से ग्रस्त हो जाए, अनेक प्रकार की कोई बीमारी हो जाए तो उससे भी विद्या की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न हो जाता है।
विद्या के अर्जन में पांचवीं बाधा है- आलस्य। आलस्य विद्या प्राप्ति में सबसे बड़ा बाधक बनता है। आलस्य मनुष्य के शरीर में रहने वाला सबसे बड़ा और महान शत्रु होता है। श्रमशीलता ज्ञान प्राप्ति में सहायक बनता है। इन पांचों बाधाओं से विद्यार्थियों को मुक्त रहने का प्रयास करना चाहिए। विद्यार्थी इन बाधाओं से दूर रहे, पुरुषार्थ करे तो अच्छे रूप में विद्या का अर्जन हो सकता है। शिक्षकों का तो कर्त्तव्य होता है कि आगे आने वाली पीढ़ी को ज्ञान के साथ-साथ अच्छे संस्कार देने का प्रयास करें। आचार्यश्री तुलसी के समय जीवन विज्ञान का उपक्रम प्रारम्भ हुआ था। द्यार्थियों में बौद्धिक व शारीरिक विकास के साथ-साथ भावात्मक विकास भी आवश्यक होता है। आचार्यश्री ने समुपस्थित विद्यार्थियों को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की प्रेरणा प्रदान करते हुए इनकी प्रतिज्ञाओं को स्वीकार करने का आह्वान किया तो विद्यार्थियों ने अपने स्थान पर खड़े होकर तीनों संकल्पों को स्वीकार किया।
आचार्यश्री ने कहा कि आज हमारा राणावास में आना हुआ है। यहां सन् 1982 में परम पूजनीय आचार्यश्री तुलसी ने चतुर्मास किया था। यहां के लोगों में अच्छे संस्कार बने रहें। आचार्यश्री के मंगल उद्बोधन के उपरान्त साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने समुपस्थित जनता व विद्यार्थियों को पावन प्रेरणा प्रदान की। श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी मानव हितकारी संघ संस्थान के अध्यक्ष श्री मोहनलाल गादिया, मंत्री श्री सुनील बाफना तथा कोषाध्यक्ष श्री मुकेशजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। स्कूल के विद्यार्थियों द्वारा भरे गए लगभग 2001 नशामुक्ति का संकल्प आचार्यश्री के चरणों में समर्पित की गई। जैन विश्व भारती के अध्यक्ष श्री अमरचंद लुंकड़ ने अपने पैतृक गांव में अपनी भावाभिव्यक्ति दी। श्री अभिषेक दुगड़ व श्री प्रमोद डी नाहर ने अपनी अभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मण्डल-राणावास ने स्वागत गीत को प्रस्तुति दी। संस्थाओं की छात्राओं ने अपनी संगीतमय प्रस्तुति दी। छोटे-छोटे विद्यार्थियों ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी। छात्र-छात्राओं द्वारा एक और प्रस्तुति दी गई। आचार्यश्री ने विद्यार्थियों को मंगल आशीर्वाद प्रदान करते हुए अनेक प्रेरणाएं प्रदान कीं। साध्वी काव्यलताजी ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावाभिव्यक्ति दी। मारवाड़ जंक्शन के उपखण्ड अधिकारी श्री महावीरसिंह जोधा ने अपनी अभिव्यक्ति दी।

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